नई दिल्ली, 1 सितंबर. खबर बड़ी है, लेकिन उससे बड़ा है सरकार का ‘ड्रामा’। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करके ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के आंदोलन से जुड़ी 129 एफआईआर रद्द कर दीं — दिल्ली, महाराष्ट्र, असम और बिहार, चार राज्यों में एक झटके में। सरकार अभी से इसे अपनी “उपलब्धि” बता रही है। सवाल एक ही है, यह वादा तो जुलाई का था। सितंबर आ गया, वो भी सुप्रीम कोर्ट के डंडे के बाद पूरा हुआ। इसमें सरकार की उपलब्धि कहां है? Supreme Court of India
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पूरी टाइमलाइन एक-एक करके समझते हैं — बिना लाग-लपेट के, जैसा हुआ वैसा।
पॉइंट नंबर 1 — आंदोलन क्यों शुरू हुआ था?
- 6 जून को नीट 2026 पेपर लीक और सीबीएसई रिजल्ट में गड़बड़ी की शिकायत लेकर छात्र जंतर-मंतर पहुंचे।
- 20 से 25 जुलाई के बीच आंदोलन अपने पीक पर पहुंचा। छात्र संसद की तरफ बढ़े।
- दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज किया, RAF उतारी गई, पानी की बौछारें छोड़ी गईं।
- नतीजा: चार राज्यों में सैकड़ों केस, हजारों नाम FIR में दर्ज।
यानी परीक्षा में गड़बड़ी की जिम्मेदारी किसी अफसर, किसी एजेंसी, किसी मंत्रालय पर नहीं आई — आई तो सड़क पर खड़े छात्रों के सिर पर, लाठी और मुकदमे की शक्ल में। कमाल का न्याय-तंत्र है।
पॉइंट नंबर 2 — सरकार ने वादा किया, फिर भूल गई
आंदोलन खत्म कराने के लिए सरकार ने खुद यह भरोसा दिलाया था कि सारे केस वापस लिए जाएंगे। छात्रों ने भरोसा किया, धरना समेटा। और उसके बाद?
पूरा अगस्त निकल गया। न आदेश आया, न नोटिफिकेशन। जिनकी सरकारी नौकरी की फाइल अटकी, जिनका पासपोर्ट रुका, जिनका एडमिशन लटका — वो रोज थाने-कचहरी के चक्कर काटते रहे। सरकार की याददाश्त वैसे ही गायब हो गई जैसे चुनाव जीतने के बाद घोषणापत्र गायब हो जाता है।
असली सवाल: वादा तोड़ने में डेढ़ महीना लगा, निभाने में सुप्रीम कोर्ट क्यों चाहिए पड़ा?
पॉइंट नंबर 3 — मार्च की धमकी से हिली सरकार
वादाखिलाफी से नाराज सीजेपी ने ऐलान कर दिया — 5 सितंबर को इंडिया गेट तक मार्च होगा। बस, यहीं से सरकार की नींद टूटी। जो काम अपने आप, बिना किसी दबाव के हो जाना चाहिए था, उसके लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को दौड़कर सुप्रीम कोर्ट पहुंचना पड़ा — अनुच्छेद 142 की गुहार लेकर।
मतलब साफ है — यह सरकार सिर्फ तभी हरकत में आती है जब सड़क पर दोबारा भीड़ जुटने की धमकी मिले। इसी को कहते हैं “जागो सरकार जागो”, वो भी डंडा दिखाने के बाद।
पॉइंट नंबर 4 — 2,873 का आंकड़ा, इतनी जल्दी कहां से आया?
सरकार ने कोर्ट में एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया — क्राइम रिकॉर्ड वाले 2,873 लोग, जिनके खिलाफ जांच जारी रहेगी। सवाल यह नहीं कि यह गलत है, सवाल यह है — यह डेटा इतनी सफाई और इतनी जल्दी कहां से आ गया?
जब निगरानी की बात हो, प्रोफाइलिंग की बात हो — तंत्र मिनटों में हरकत में आ जाता है। और जब बात राहत देने की, वादा निभाने की हो — वही तंत्र कछुए की चाल पकड़ लेता है। यह इत्तेफाक नहीं, यह पैटर्न है।
पॉइंट नंबर 5 — मुआवजे पर फिर तीन महीने का इंतजार
जिन बच्चों की जान पेपर लीक के सदमे में गई, जिन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठाया — उनके परिवारों को मुआवजे पर फैसला अभी और तीन महीने बाद होगा। यानी जिस त्रासदी पर पूरा आंदोलन खड़ा हुआ, उस पर ‘न्याय’ अब भी दूर है। शर्मिंदगी से बचने के फैसले घंटों में आते हैं, इंसान के दर्द पर मरहम के लिए महीने चाहिए — यही सरकारी वक्त-प्रबंधन है।
पॉइंट नंबर 6 — दिल्ली पुलिस, तुम्हारी लाठी का हिसाब कौन देगा?
जिन छात्रों पर जुलाई में लाठियां बरसाई गईं, जिन पर मुकदमे लादे गए — आज वही मुकदमे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिए। तो सवाल सीधा है — वो लाठीचार्ज, वो केस, किस आधार पर, किसकी मंजूरी से हुए थे? जो पुलिस वीवीआईपी काफिले के लिए मिनटों में सड़क खाली कराती है, वही एक निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली मांगने वाले छात्रों के लिए डंडा उठा लेती है। यह “एक्शन” नहीं था, यह ओवररिएक्शन था — और इसका हिसाब अभी बाकी है। Delhi Police
पॉइंट नंबर 7 — कांग्रेस और राजनितिक पार्टी, जीत के बाद बधाई का नाटक बंद करो
फैसला आते ही कांग्रेस और बाकी विपक्षी खेमे में बधाई और हमदर्दी के बयानों की बाढ़ आ गई। “हम छात्रों के साथ हैं” के पोस्ट, प्रेस कॉन्फ्रेंस — सब हाजिर। लेकिन जुलाई में जब लाठियां बरस रही थीं, तब यही विपक्ष कहां था? कुछ नेता जंतर-मंतर पहुंचे जरूर, पर संसद के भीतर-बाहर लगातार, संगठित लड़ाई नदारद रही। जीत का श्रेय लेने सब आ जाते हैं, थाने के चक्कर काटने वाले सिर्फ छात्र और उनके परिवार रह जाते हैं।

पॉइंट नंबर 8 — अनुच्छेद 142 का वो पेच, जो कोई नहीं बता रहा
अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल के बाद इस फैसले को कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती। यानी सरकार ने बड़ी होशियारी से यह भी पक्का कर लिया कि कभी कोई यह सवाल न पूछ सके — पहली बार एफआईआर दर्ज करने का फैसला किसने लिया, किस आधार पर लिया। न्याय मिल गया, पर जवाबदेही की फाइल हमेशा के लिए बंद हो गई।
जीत छात्रों की है, श्रेय सरकार का नहीं
129 केस रद्द होना राहत की बात है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन यह जीत सरकार की “संवेदनशीलता” से नहीं, छात्रों की जिद, उनकी थकान, उनकी मुसीबतों से मिली है। अगर 5 सितंबर के मार्च का ऐलान न होता, तो यह “उपलब्धि” अब भी किसी फाइल में सोई पड़ी होती। जिसे सरकार अपनी सक्रियता बता रही है, वो असल में जनता के दबाव के आगे झुकना है — फर्क समझना जरूरी है।
दूसरा पक्ष
सरकार और प्रशासन का पक्ष भी जानना जरूरी है। सरकार का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ जगहों पर बैरिकेड तोड़े गए, संपत्ति को नुकसान पहुंचा और पुलिस से झड़प हुई, जिस वजह से कार्रवाई जरूरी थी। दिल्ली पुलिस के मुताबिक जिस रास्ते से प्रदर्शनकारी संसद की तरफ बढ़ रहे थे, उसकी अनुमति नहीं थी, इसलिए भीड़ को रोकना सुरक्षा कारणों से जरूरी था।
सरकार यह भी कहती है कि 2,873 आपराधिक-रिकॉर्ड वाले लोगों पर जांच जारी रखना शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को असामाजिक तत्वों से अलग करने के लिए है, आंदोलन दबाने के लिए नहीं। मुआवजे में देरी की वजह सरकार हर मामले की अलग जांच जरूरी होना बताती है। इन तर्कों को स्वीकार करना या न करना पाठकों के विवेक पर है।
