कस्टोडियल डेथ मामला: 5 बड़े सवाल, CBI जांच से DGP पर संकट?

कस्टोडियल डेथ मामला: 5 बड़े सवाल, CBI जांच से DGP पर संकट?

कस्टोडियल डेथ मामला में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद CBI हुई सक्रिय। DGP अरुण देव गौतम की कुर्सी पर मंडराया संकट। जानिए इस बड़े मामले के सभी ताजा अपडेट।

बिलासपुर/दिल्ली। छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ मामला में पुलिसिंग व्यवस्था इन दिनों देश की सर्वोच्च अदालत के निशाने पर है। “कस्टोडियल डेथ” यानी पुलिस हिरासत में मौत जैसे गंभीर और संवेदनशील मामलों में राज्य पुलिस के लचर रवैये, विवेचना में बरती गई गंभीर लापरवाही और जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति ने अब पूरे पुलिस महकमे को कठघरे में ला खड़ा किया है।

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश के बाद CBI ने बिलासपुर में डेरा डाल दिया है और एक विशेष टीम गठित कर उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी है। सूत्रों की मानें तो जांच एजेंसी की रडार पर सिर्फ निचले स्तर के पुलिसकर्मी नहीं, बल्कि वे वरिष्ठ IPS अधिकारी भी हैं जिनकी कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही गंभीर आपत्ति जता चुका है। विधानसभा सचिवालय पर बड़े सवाल: 8.65 करोड़ की सुरक्षा राशि, 125 टीवी और पुराने सामान का हिसाब कौन देगा?

कस्टोडियल डेथ मामला क्या है : श्रवण सूर्यवंशी की मौत की पूरी कहानी

इस पूरे प्रकरण की जड़ में बिलासपुर के मोहरा इलाके के रहने वाले 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की मौत है। श्रवण को आबकारी अधिनियम (एक्साइज एक्ट) से जुड़े एक मामले में स्थानीय सीपत थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद 19 जनवरी 2024 को उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर में दाखिल कराया गया। लेकिन जेल में दाखिल होने के बाद से ही उसकी सेहत लगातार बिगड़ती चली गई। हालत गंभीर होने पर 21 जनवरी 2024 को उसे सिम्स अस्पताल रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।

कस्टोडियल डेथ मामला

परिवार के अनुसार यह कोई सामान्य मौत नहीं, बल्कि हिरासत में हुई प्रताड़ना और लापरवाही का नतीजा थी। श्रवण के परिजनों ने जब न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तब जाकर छत्तीसगढ़ की पुलिसिंग व्यवस्था की खामियां सतह पर आनी शुरू हुईं। सूत्र यह भी दावा करते हैं कि श्रवण अकेला ऐसा मामला नहीं है — प्रदेश में ऐसे दर्जनों पीड़ित हैं जिन्हें “कस्टोडियल डेथ” का शिकार होना पड़ा है, लेकिन ज्यादातर मामलों में न तो निष्पक्ष जांच हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई।

कस्टोडियल डेथ मामला में सुप्रीम कोर्ट की फटकार : DGP को बताया “पूरी तरह अयोग्य”

इसी महीने अगस्त 2026 में कस्टोडियल डेथ के इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम की कार्यप्रणाली पर बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए उन्हें “पूरी तरह अयोग्य” (Totally Incompetent) करार दिया। अदालत की यह नाराजगी बेवजह नहीं थी — कोर्ट ने पाया कि इस मामले में FIR दर्ज करने में ढाई साल से ज्यादा की देरी हुई, और पूरे प्रकरण में लीपापोती करने की कोशिश की गई।

कस्टोडियल डेथ मामला : DGP अरुण देव गौतम

गौरतलब है कि जब कोई मामला न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बावजूद ढाई साल तक FIR के इंतजार में लटका रहे, तो यह सीधे तौर पर सिस्टम की नाकामी और जवाबदेही से बचने की मंशा को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ एक अधिकारी की व्यक्तिगत आलोचना भर नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य पुलिस मुख्यालय की कार्यशैली पर एक बड़ा सवालिया निशान है। अदालत की फटकार के बाद अब खुद DGP अरुण देव गौतम इस मामले में एक “पार्टी” बन गए हैं, जिससे उनकी स्थिति और भी पेचीदा हो गई है।

कस्टोडियल डेथ मामला में CBI की एंट्री : बिलासपुर से लेकर सेंट्रल जेल तक सुगबुगाहट तेज़

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद CBI ने इस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली है। जांच एजेंसी की एक टीम ने बिलासपुर पहुंचकर मामले से जुड़े सबूत और दस्तावेज़ इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। सेंट्रल जेल बिलासपुर से लेकर स्थानीय थानों तक CBI की सक्रियता को लेकर हलचल तेज़ है। सूत्रों के मुताबिक, CBI ने सीपत थाना क्षेत्र के तत्कालीन पुलिस और जेल अधिकारियों के साथ-साथ श्रवण के पोस्टमार्टम के दौरान मौजूद रहे डॉक्टरों से भी संपर्क साधा है।

सूत्रों का यह भी दावा है कि CBI इस मामले में “कर्तव्यविमुख” पाए जाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने में कोई कोताही नहीं बरतेगी। यानी अगर जांच में किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो उसके खिलाफ सीधी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। हालांकि जमीनी स्तर पर CBI की टीम को पुलिस महकमे के असहयोगात्मक रवैये का भी सामना करना पड़ रहा है, जिससे जांच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

विवादों में क्यों घिर रहा है DGP को पद पर बनाए रखने का फैसला

कस्टोडियल डेथ मामला अब सिर्फ एक मौत की जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने राज्य में प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल भी पैदा कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस DGP को खुद सुप्रीम कोर्ट “पूरी तरह अयोग्य” ठहरा चुका है और जो अब अदालत में स्वयं एक पक्षकार बन चुके हैं, उन्हें पद पर बनाए रखने का क्या औचित्य है?

कस्टोडियल डेथ मामला

पीड़ित परिवार और याचिकाकर्ता इस स्थिति को हैरानी से देख रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, DGP को तत्काल पद से हटाने की मांग को लेकर एक नई याचिका अदालत में दाखिल किए जाने की तैयारी जोरों पर है। इस प्रस्तावित याचिका में यह तर्क दिया गया है कि जब तक “कस्टोडियल डेथ” प्रकरण से जुड़े गैर-जिम्मेदार अधिकारियों को पद से नहीं हटाया जाता, तब तक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की उम्मीद करना बेमानी होगा। याचिका में छत्तीसगढ़ सरकार से इस मामले से सीधे जुड़े सभी संबंधित अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से हटाने के लिए दोबारा सख्त निर्देश जारी करने की मांग की गई है।

DGP चयन प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

कस्टोडियल डेथ प्रकरण ने छत्तीसगढ़ में DGP की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित याचिका में यह आरोप भी शामिल किया जा रहा है कि DGP के चयन के दौरान योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों को जानबूझकर दरकिनार किया गया, जबकि तिकड़म के जरिए वरिष्ठता सूची में हेरफेर कर मनचाहे अधिकारियों को “DGP पैनल” में शामिल कराया गया।

कस्टोडियल डेथ मामला : PH cg

याचिका के तथ्यों के अनुसार, उन वरिष्ठ IAS अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है, जिन्होंने कथित रूप से “अयोग्य” IPS अधिकारी को DGP पद के लिए अनुशंसित किया। आरोप है कि कुछ खास अधिकारियों को सुविधाजनक तरीके से उच्च पद पर बिठाने के लिए योग्य दावेदारों को पैनल की प्रतिस्पर्धी सूची से बाहर करने का रास्ता अपनाया गया। अगर यह याचिका अदालत में स्वीकार होती है, तो यह न सिर्फ इस विशेष मामले बल्कि राज्य में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति प्रक्रिया की समूची व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर सकती है।

पिछले तीन सालों में क्यों बढ़े “कस्टोडियल डेथ” के मामले?

जानकारों की मानें तो छत्तीसगढ़ में बीते तीन वर्षों के दौरान हिरासत में मौत के मामलों में अचानक तेज़ी देखी गई है। इसके पीछे मुख्य वजह पुलिस मुख्यालय का गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि इन मामलों में अक्सर एक जैसा पैटर्न देखने को मिलता है — कभी फर्जी तरीके से अपराध कबूल करवाने के लिए दबाव बनाया जाता है, तो कभी अवैध वसूली के मकसद से हिरासत में प्रताड़ना की घटनाएं सामने आती हैं।

ऐसे मामलों में शामिल पुलिसकर्मियों की एक लंबी फेहरिस्त बताई जाती है, लेकिन विवेचना के दौरान अक्सर सिर्फ गिने-चुने निचले स्तर के कर्मियों को ही दोषी ठहराया जाता रहा है। इसके उलट थाना प्रभारियों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक को जांच अधिकारियों ने अपने ही स्तर पर क्लीनचिट देने में देरी नहीं की। सूत्रों का यह भी दावा है कि “कस्टोडियल डेथ” जैसे गंभीर मामलों में संलिप्त पाए गए कई अधिकारियों के प्रति पुलिस मुख्यालय का रवैया उदार रहा है, जिसके चलते विवादित अधिकारी मनचाही पोस्टिंग हासिल करने में भी कामयाब होते रहे हैं।

कस्टोडियल डेथ मामला में सिस्टम पर बड़ा सवाल : आखिर कब तक होगी जवाबदेही तय?

जानकारों का मानना है कि श्रवण सूर्यवंशी की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा हस्तक्षेप केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित मुद्दा नहीं है। यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर सवाल है — कि हिरासत में होने वाली मौतों की जांच पुलिस अपने ही स्तर पर कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से करती है?

अगर किसी मामले में न्यायिक जांच रिपोर्ट आने के बावजूद पीड़ित परिवार को FIR दर्ज कराने के लिए ढाई साल से ज्यादा इंतजार करना पड़े, और पुलिस मुख्यालय अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ ले, तो यह व्यवस्था की साख पर सीधा प्रहार है। जब मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट को CBI के हवाले करनी पड़े, तो जाहिर है कि राज्य सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कस्टोडियल डेथ मामला

कस्टोडियल डेथ मामला में राज्य सरकार की चुप्पी, सरकारी अधिकारियों से संपर्क बेनतीजा

इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू राज्य सरकार की चुप्पी है। जानकारी के अनुसार, DGP सहित अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इस विषय पर प्रतिक्रिया जानने के लिए गृहमंत्री सहित राज्य सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई प्रति उत्तर प्राप्त नहीं हुआ।

इसके अलावा घटनाक्रम से जुड़े पुलिस महकमे के कई निचले स्तर के कर्मचारी भी सच सामने लाने से कतरा रहे हैं। इसकी वजह वरिष्ठ अधिकारियों का पद और प्रभाव बताया जा रहा है, जिसके चलते जमीनी स्तर के कर्मचारी हकीकत बयां करने में झिझक महसूस कर रहे हैं। यह स्थिति साफ दिखाती है कि जांच को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए किस तरह के दबाव और चुनौतियों का सामना CBI टीम को करना पड़ रहा है।

कस्टोडियल डेथ मामला : मंत्रालय cg

कस्टोडियल डेथ मामला में आगे क्या होगा?

फिलहाल सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाली उस नई याचिका पर टिकी हैं, जिसमें DGP अरुण देव गौतम सहित अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल हटाने की मांग की जा रही है। साथ ही CBI की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और वह किन अधिकारियों को कठघरे में खड़ा करती है, इस पर भी पूरे प्रदेश की नज़र है।

कस्टोडियल डेथ मामला अब सिर्फ एक परिवार के न्याय की लड़ाई नहीं रह गया, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की समूची पुलिसिंग व्यवस्था, अधिकारियों की जवाबदेही और DGP जैसी शीर्ष नियुक्तियों की पारदर्शिता को लेकर एक बड़ी बहस का केंद्र बन चुका है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का रुख़ और CBI जांच की प्रगति यह तय करेगी कि राज्य में “कस्टोडियल डेथ” जैसे संवेदनशील मामलों में असली जवाबदेही तय हो पाती है या नहीं।

Supreme Court of India – आधिकारिक वेबसाइट


नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध सूत्रों, न्यायिक कार्यवाही की जानकारी और मीडिया में मिली जानकारी पर आधारित है। मामला अभी विचाराधीन है और आगे की जानकारी सामने आने पर स्थिति में बदलाव संभव है।

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