रायपुर। छत्तीसगढ़ की सत्ता की कुर्सी अब किसके हाथ में जाने वाली है, इसका सीधा जवाब हाल में निकली IPS तबादला सूची में छिपा बैठा है। भाजपा ने सत्ता में आकर अच्छे दिनों का जो वादा जनता से किया था, वह अब कूड़े के ढेर में पड़ा सड़ रहा है। आम आदमी सिर्फ सरकारी जुल्म सह रहा है और उसे साफ महसूस हो रहा है कि अगले दो साल के अंदर यह हुकूमत अपनी विदाई का सामान बांध लेगी।
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विष्णुदेव साय के मुख्यमंत्री बनते ही प्रदेश में कानून का राज दिन-ब-दिन कमजोर पड़ता चला गया। पुलिस तंत्र की बदहाली का सबसे बड़ा सबूत बेमेतरा में सामने आया। वहां एक महिला ने फंदा लगा लिया था। उसकी सांसें अभी बाकी थीं, लेकिन पुलिस वालों ने कोई जांच-पड़ताल किए बिना ही उसे मुर्दा मानकर कमरे का ताला जड़ दिया। करीब दो घंटे तक वह कमरा बंद रहा। न कोई डॉक्टर पहुंचा, न किसी जवान ने अंदर झांककर हाल पूछा। आत्महत्या की राह पर निकली उस महिला को कोई सहारा नहीं मिला। बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सच्चाई का पर्दाफाश कर दिया। खाकी वर्दी दोबारा मिट्टी में मिल गई।
ये हालात अचानक नहीं बने। पूरे प्रदेश में रेप और हत्या जैसे बड़े जुर्मों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। इसकी जड़ में पुलिस मुख्यालय की कमान अयोग्य डीजीपी के हाथ में सौंपना है। नतीजा ये है कि जनता की जान और माल दोनों खतरे में हैं और भाजपा सरकार की साख भी हवा में लटकी हुई है।
छत्तीसगढ़ पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट
IPS तबादला – सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी की कार्यशैली पर कसी नकेल
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा डीजीपी की कार्यशैली पर जोरदार नकेल कसी थी और उन्हें अयोग्य ठहरा दिया था। कोर्ट के उस आदेश को आए पखवाड़े से ज्यादा गुजर चुके हैं। फिर भी अयोग्य शख्स कुर्सी पर जमे हुए हैं। उसके उलट सोमवार को IPS तबादला की बड़ी सूची जारी कर दी गई। इस IPS तबादला ने प्रशासनिक दफ्तरों और सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। अयोग्य को छुआ तक नहीं गया, काबिल अफसरों को इधर-उधर ठेल दिया गया।
भाजपा के सत्ताधारी और संगठन वाले कई बड़े चेहरे इस IPS तबादला सूची को देखकर स्तब्ध हैं। सूत्रों के अनुसार न अफसरों की काबिलियत तौली गई, न उनके सेवाकाल का लिहाज किया गया। नाम जाहिर न करने की शर्त पर मैदानी नेता बता रहे हैं कि विवादों से लदी ये IPS तबादला सूची दरअसल भाजपा के सत्ता से विदा होने का खुला संदेश है।
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पर्याप्त संख्या में आईपीएस अफसर मौजूद होने के बावजूद कई लोगों के सिर पर दो-दो और तीन-तीन जिम्मेदारियां लाद दी गईं। वरिष्ठ अफसरों को कनिष्ठों वाले काम सौंपकर उनका अपमान कर दिया गया। जानकारों के मुताबिक ये IPS तबादला प्रशासन सुधारने या कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए नहीं हुए। इन्हें किसी सुपर सीएम जैसे ताकतवर व्यक्ति की खुशहाली से जोड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस IPS तबादला में न मुख्यमंत्री साय की मंशा का ख्याल रखा गया, न पुलिस मुख्यालय में सालों से चल रहे कामकाज के तौर-तरीकों का। मुख्यमंत्री मजबूत पुलिसिंग चाहते हैं, लेकिन उनके आदेश ताकतवर अफसरशाही के आगे बेअसर साबित हो रहे हैं।

सत्ताधारी दल के अंदर ये भी चर्चा है कि थानेदार से लेकर एसपी तक की तैनाती में भी मुख्यमंत्री के निर्देशों को पहले ही ताक पर रख दिया गया था। अब IPS तबादला महज कागजी औपचारिकता और चहेतों को लाभ पहुंचाने का जरिया बनकर रह गए हैं। सूत्रों का कहना है कि इस आईपीएस तबादला के नतीजे आगे चलकर भारी पड़ेंगे। कई लोगों को डर है कि जनता की उम्मीदों को कुचलने का ये सिलसिला कांग्रेस को सत्ता का रास्ता साफ कर रहा है।

प्रदेश में इन दिनों IPS तबादला की आंधी चल रही है। कांग्रेस ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि भाजपा ट्रांसफर का खुला कारोबार कर रही है। ये आरोप नया नहीं। सत्ता संभालते ही सुपर सीएम और अफसरशाही की लॉबी ने अयोग्य आईपीएस को डीजीपी पद पर बैठा दिया था। उसके बाद से कानून-व्यवस्था के बिगड़ने के किस्से एक के बाद एक सामने आने लगे। कभी एसपी-कलेक्टर पर कार्रवाई की खबर आई, कभी थानेदारों पर गाज गिरी, लेकिन डीजीपी की अयोग्यता पर हमेशा चुप्पी साध ली गई।
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इस IPS तबादला सूची को वरिष्ठ अफसरों की इज्जत पर सीधा हमला माना जा रहा है। पुरानी परंपराओं और नियमों को किनारे रखकर वरिष्ठों को कनिष्ठों वाले प्रभार देकर भेज दिया गया। ये साधारण आईपीएस तबादला है या उनकी बेइज्जती का दस्तावेज—सवाल हवा में तैर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी को अयोग्य करार देने में जरा भी देर नहीं लगाई। आदेश जारी हुए काफी वक्त बीत चुका है। फिर भी अयोग्य को हटाने की बजाय काबिल अफसरों के बेमतलब आईपीएस तबादला सुर्खियां बना रहे हैं। इसे सरकार की भारी चूक माना जा रहा है। अब आम आदमी सीधे सवाल कर रहा है कि अयोग्य डीजीपी को कब तक जनता के सिर पर थोपे रखा जाएगा।

ये हालात सिर्फ प्रशासनिक नाकामी नहीं बल्कि राजनीतिक संकट का रूप ले चुके हैं। जब पुलिस का सबसे बड़ा अफसर खुद अयोग्य करार दिया जा चुका हो और फिर भी कुर्सी न हिल रही हो तो नीचे के अफसरों का मनोबल कैसे टिका रहेगा। वरिष्ठ अफसरों को जानबूझकर कमतर जिम्मेदारियां देकर उनका हौसला तोड़ा जा रहा है। इससे पूरे पुलिस तंत्र में असंतोष बढ़ना तय है। मैदानी स्तर पर काम करने वाले जवान और अधिकारी पहले से ही दबाव में हैं। ऊपर से नेतृत्व की अयोग्यता और बीच में वरिष्ठों का अपमान पूरे सिस्टम को और कमजोर कर रहा है।
सियासी गलियारों में ये भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री के पास वास्तविक अधिकार कितने बचे हैं, ये सवाल अब खुलकर उठने लगा है। अगर उनके निर्देश थानेदार स्तर से लेकर आईपीएस स्तर तक लगातार अनसुने हो रहे हैं तो सत्ता की असली चाबी किसके हाथ में है। सुपर सीएम वाली चर्चा अब फुसफुसाहट से निकलकर खुली बातचीत का विषय बन गई है। अफसरशाही की लॉबी इतनी मजबूत हो चुकी है कि चुनी हुई सरकार के आदेश भी कागजों तक सिमट कर रह जा रहे हैं। इस आईपीएस तबादला ने इन सवालों को और तेज कर दिया है।

जनता के बीच असंतोष धीरे-धीरे गहराता जा रहा है। लोग देख रहे हैं कि अपराध बढ़ रहे हैं, पुलिस संवेदनहीन होती जा रही है और सत्ताधारी दल अपनी कुर्सी बचाने के खेल में लगा हुआ है। बेमेतरा जैसी घटनाएं आम आदमी के दिल में गहरी चोट छोड़ जाती हैं। जब कोई व्यक्ति फंदे पर लटक रहा हो और पुलिस उसे जिंदा होने के बावजूद मर चुका मान ले तो भरोसा कैसे बचेगा। ऐसे में सरकार की साख गिरना स्वाभाविक है। IPS तबादला ने जनता के गुस्से को और हवा दी है।
IPS तबादला या ट्रांसफर उद्योग – कांग्रेस
कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाने की पूरी कोशिश में है। ट्रांसफर उद्योग का आरोप लगाकर वह सरकार को घेर रही है। विपक्ष का कहना है कि सत्ता में आने के बाद से लगातार एक ही लॉबी हावी रही है जिसने पहले अयोग्य को ऊपर बैठाया और अब काबिल अफसरों को किनारे कर रही है। ये आरोप सत्ताधारी दल के अंदर भी बेचैनी पैदा कर रहे हैं। कई नेता निजी बातचीत में मान रहे हैं कि अगर यही रवैया जारी रहा तो अगले चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। IPS तबादला को लेकर अंदरूनी नाराजगी साफ दिख रही है।
प्रदेश की कानून-व्यवस्था की हालत दिन-ब-दिन चिंताजनक होती जा रही है। गंभीर जुर्मों की संख्या बढ़ना सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं बल्कि आम जीवन की असुरक्षा का संकेत है। जब पुलिस का शीर्ष नेतृत्व खुद विवादों में घिरा हो तो नीचे का तंत्र कैसे प्रभावी रह सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज करना सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़े कर रहा है। अयोग्य को बचाए रखना और काबिल को ठेलना प्रशासनिक सुधार की बजाय राजनीतिक संरक्षण का खेल लगता है। इस IPS तबादला ने संरक्षण के खेल को और उजागर कर दिया है।
आगे के दिनों में ये मुद्दा और गरमाने वाला है। अगर अयोग्य डीजीपी को हटाया नहीं गया और वरिष्ठ अफसरों के अपमान का सिलसिला जारी रहा तो सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। जनता अब सिर्फ वादों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। वह नतीजे देखना चाहती है।
फिलहाल नतीजे सिर्फ निराशा और गुस्सा बढ़ा रहे हैं। दो साल का वक्त बाकी है लेकिन हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि सत्ता की कुर्सी पहले ही डगमगाने लगी है। भाजपा के लिए ये सबक है कि कुर्सी बचाने के खेल में जनता को नाराज करना भारी पड़ सकता है। छत्तीसगढ़ की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है जहां प्रशासनिक नाकामी सीधे सियासी कीमत वसूलने वाली है। आईपीएस तबादला ने इस मोड़ को और नजदीक ला दिया है।
