लाठी भी अपनी, भैंस भी अपनी! पूर्व चुनाव आयुक्त ने एसआईआर पर पूछा ! कानून तो ठीक है, पर इंसाफ कहां गया?

र्व चुनाव आयुक्त ने एसआईआर पर पूछा — कानून तो ठीक है, पर इंसाफ कहां गया?

नई दिल्ली में एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसने देशभर में चल रहे मतदाता सूची विवाद को फिर हवा दे दी है. पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने गुरुवार, 3 सितंबर को खुलेआम एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए. लवासा ने जो कहा, वह किसी आम आलोचना जैसा नहीं था उन्होंने सीधे पूछा कि एसआईआर भले ही कानूनी हो, लेकिन क्या यह निष्पक्ष भी है?

 एसआईआर पर सवाल, पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मतदाता सूची पर उठाई चिंता

“मैंने सिर फोड़ दिया, फिर भी जेल नहीं गया” स्वतंत्र भारद्वाज के कबूलनामे ने खोली पुलिस और सिस्टम की पोल

अशोक लवासा ने मंच से क्या कहा?

नई दिल्ली में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर द्वारा आयोजित ‘प्रोफेसर जगदीप छोकर मेमोरियल लेक्चर’ में बोलते हुए अशोक लवासा ने एसआईआर प्रक्रिया पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं के पास कानून की ताकत है, वे अब यह मानने लगी हैं कि वे जो कुछ भी करती हैं, वह अपने आप सही हो जाता है. लवासा ने इसे एक कहावत से जोड़ते हुए कहा कि यह “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली सोच का उदाहरण है, यानी जिसके पास ताकत है, फैसला उसी के पक्ष में जाता है.

अशोक लवासा ने सीधे एसआईआर का जिक्र करते हुए कहा कि देश के करोड़ों लोगों पर एक गलत प्रक्रिया थोप दी गई है, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि न्यायपालिका ने इस एसआईआर प्रक्रिया को वैध भी ठहरा दिया. यहीं से लवासा का सबसे तीखा सवाल निकलता है “बेशक, यह कानूनी है. लेकिन क्या यह निष्पक्ष है?”

पूर्व चुनाव आयुक्त ने इतने पर ही बात खत्म नहीं की. उन्होंने आगे जोड़ा कि न्याय का मतलब सिर्फ कानून के शब्दों को लागू करना नहीं होता, बल्कि कानून की भावना की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है. और फिर उन्होंने अपने भाषण में एक ऐसा वाक्य कहा जो अब हर जगह गूंज रहा है, “यह निश्चित रूप से निष्पक्ष नहीं है.”

13 करोड़ नाम और एक बड़ा सवाल

एसआईआर प्रक्रिया पर बोलते हुए अशोक लवासा ने एक आंकड़ा रखा, जिसने पूरे हॉल को चौंका दिया. उन्होंने पूछा “आप 13 करोड़ नाम (मतदाता सूचियों से) हटाए जाने को कैसे समझाएंगे?” यह सवाल सीधे तौर पर एसआईआर प्रक्रिया की मंशा और उसके नतीजों पर उंगली उठाता है. Election Commission of India – SIR 2026

लवासा ने आगे एक और गंभीर चिंता जताई. उन्होंने पूछा कि क्या एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं के जरिए ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है, जिसमें आम लोग लोकतंत्र की प्रक्रिया से निराश होकर उससे दूर हो जाएं? उन्होंने याद दिलाया कि वैसे भी देश में करीब 33 प्रतिशत लोग वोट ही नहीं डालते, और लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत भी सिर्फ 67 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है. ऐसे में अगर एसआईआर जैसी प्रक्रिया के चलते वोट डालना और मुश्किल हो जाए, तो नतीजा क्या होगा?

लवासा ने कहा कि अब ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिसमें आम आदमी के लिए मतदान करना बेहद कठिन होता जा रहा है, और उनके संवैधानिक अधिकार को लेकर लोगों के मन में भारी चिंता पैदा हो गई है. उन्होंने इस बात पर खास जोर दिया कि इस तरह की स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई.

एसआईआर के आंकड़े — जमीनी हकीकत क्या कहती है?

अब जरा एसआईआर के जमीनी आंकड़ों पर नजर डालते हैं, जो लवासा के सवालों को और वजनदार बना देते हैं. द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक एसआईआर के तीसरे चरण के लिए जारी मसौदा मतदाता सूचियों से पता चलता है कि देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों से कुल 6.15 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं. हालांकि अंतिम सूची आने पर इन आंकड़ों में कुछ बदलाव संभव है, लेकिन जिस पैमाने पर यह छंटाई हुई है, उसने एसआईआर से पहले मौजूद मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

एसआईआर के आंकड़े — जमीनी हकीकत क्या कहती है?

राज्यवार आंकड़े देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है. महाराष्ट्र में साल 2024 के विधानसभा चुनाव में वोट डालने वाले कुल मतदाताओं में से करीब एक-तिहाई मतदाताओं के नाम एसआईआर के दौरान हटा दिए गए. कर्नाटक में तो हालात इससे भी ज्यादा चौंकाने वाले हैं — यहां 2023 के विधानसभा चुनाव में मतदान करने वाले लगभग आधे मतदाताओं के नाम एसआईआर की सूची से गायब हो गए. तेलंगाना में भी 2023 के चुनाव में वोट डालने वालों में से करीब एक-तिहाई के करीब नाम हटाए गए हैं.

सबसे ज्यादा नाम हटाए जाने के प्रतिशत के लिहाज से दिल्ली सबसे ऊपर है, जहां 32.78 प्रतिशत नाम एसआईआर की जद में आकर हट गए. इसके बाद दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में 29.65 प्रतिशत, तेलंगाना में 21.69 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 21.14 प्रतिशत, कर्नाटक में 19.48 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 19.09 प्रतिशत नाम हटाए गए.

अब यहां सवाल यह उठता है क्या इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाया जाना सिर्फ एक तकनीकी और प्रशासनिक सफाई प्रक्रिया है, या फिर इसके पीछे कुछ और मंशा भी छिपी हो सकती है, जैसा कि अशोक लवासा इशारा कर रहे हैं?

कानूनी बनाम निष्पक्ष — फर्क कहां है?

अशोक लवासा के भाषण का सबसे दमदार हिस्सा यही है, जहां वे कानूनी और निष्पक्ष के बीच की रेखा खींचते हैं. यह समझना जरूरी है कि कोई भी प्रक्रिया अदालत से मंजूरी पा लेने भर से पूरी तरह सही साबित नहीं हो जाती. अदालत यह देखती है कि कोई कदम संविधान और कानून के दायरे में है या नहीं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर कानूनी कदम व्यवहार में हर नागरिक के साथ बराबरी और निष्पक्षता से पेश आए.

अशोक लवासा जैसे किसी शख्स का यह सवाल उठाना और भी अहम हो जाता है, क्योंकि वे खुद चुनाव आयोग जैसी संस्था का हिस्सा रह चुके हैं और चुनावी प्रक्रियाओं की बारीकियों को करीब से समझते हैं. जब एक पूर्व चुनाव आयुक्त खुद खड़े होकर एसआईआर पर सवाल उठाए, तो यह महज एक विपक्षी बयान नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर से उठी एक गंभीर चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए.

लोकतंत्र से दूरी का खतरा

लवासा का यह कहना कि लोग लोकतंत्र की प्रक्रिया से निराश और विमुख हो सकते हैं, अपने आप में एक बड़ी चेतावनी है. भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां पहले से ही मतदान प्रतिशत कभी 70 प्रतिशत के पार नहीं गया, वहां अगर एसआईआर जैसी प्रक्रिया के चलते और लोग मतदाता सूची से बाहर होते हैं या वोट डालने में असमर्थ महसूस करते हैं, तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों की व्यापकता और प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है.

सवाल यह भी है कि जिन 13 करोड़ नामों की बात लवासा ने की, उनमें से कितने वाकई फर्जी या डुप्लीकेट मतदाता थे, और कितने ऐसे असली नागरिक हैं जो किसी दस्तावेजी दिक्कत, पते में बदलाव, या प्रक्रिया की जटिलता के चलते सूची से बाहर हो गए? यह फर्क समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसी फर्क में एसआईआर की निष्पक्षता या भेदभाव का असली सच छिपा है.

प्रोफेसर छोकर की विरासत और लोकतांत्रिक चिंता

यह लेक्चर जिस मौके पर हो रहा था, वह भी अपने आप में अहम है. प्रोफेसर जगदीप छोकर, जिनकी याद में यह व्याख्यान आयोजित हुआ, एडीआर के सह-संस्थापकों में से एक थे. वे एक जाने-माने शिक्षाविद, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, वकील, इंजीनियर और पर्यावरण संरक्षणवादी के तौर पर जाने जाते थे. उनका पूरा जीवन लोकतंत्र को मजबूत करने और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता लाने के लिए समर्पित रहा.

कार्यक्रम में प्रोफेसर छोकर के लेखों की एक किताब का विमोचन भी हुआ, जिसमें उनके लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण को रेखांकित किया गया है. अशोक लवासा ने इस मौके पर प्रोफेसर छोकर के साथ अपने निजी रिश्तों और उर्दू शायरी के प्रति दोनों की साझा दिलचस्पी का भी जिक्र किया, जिससे यह लेक्चर सिर्फ राजनीतिक-प्रशासनिक बहस तक सीमित न रहकर एक भावनात्मक श्रद्धांजलि का रूप भी ले गया.

लेकिन इस भावनात्मक पहलू के बीच जो सबसे बड़ी बात उभरकर सामने आई, वह है एसआईआर को लेकर उठाया गया सवाल — कि क्या ऐसी संस्थाएं जो कानून की ताकत रखती हैं, अब खुद को हर फैसले में स्वतः सही मान बैठी हैं?

एसआईआर पर अब तक क्यों नहीं मिला ठोस जवाब?

गौर करने वाली बात यह है कि एसआईआर से जुड़े आंकड़े 6.15 करोड़ नाम हटाए जाने से लेकर 13 करोड़ के दावे तक लगातार सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनते रहे हैं, लेकिन अब तक इस पर कोई स्पष्ट, विस्तृत और पारदर्शी सफाई सामने नहीं आई है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में नाम क्यों हटाए गए. क्या हर हटाया गया नाम वाकई अपात्र था? क्या कोई स्वतंत्र ऑडिट प्रक्रिया मौजूद है जो यह पुष्टि कर सके कि एसआईआर के दौरान कोई गड़बड़ी नहीं हुई?

यही वे सवाल हैं जो अशोक लवासा के भाषण के बाद और तेज हो गए हैं. जब एक पूर्व चुनाव आयुक्त खुद एसआईआर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, तो आम नागरिक के मन में यह शंका उठना स्वाभाविक है कि आखिर मतदाता सूचियों से जुड़ी यह पूरी कवायद किसके हित में की जा रही है, और इसका असली मकसद क्या है.

आगे क्या?

अशोक लवासा का यह बयान सिर्फ एक लेक्चर तक सीमित नहीं रहने वाला. जिस तरह एसआईआर को लेकर राज्यवार आंकड़े सामने आ रहे हैं. दिल्ली में सबसे ज्यादा 32.78 प्रतिशत नाम हटना, कर्नाटक में करीब आधे मतदाताओं का सूची से बाहर होना, उससे यह तय है कि एसआईआर का मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ेगा.

सवाल अब सिर्फ यह नहीं रह गया है कि एसआईआर कानूनी है या नहीं, अदालत पहले ही इस पर मुहर लगा चुकी है. असली सवाल वही है जो अशोक लवासा ने बड़ी बेबाकी से पूछा. क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष है? और अगर करोड़ों नागरिकों के मताधिकार पर इसका सीधा असर पड़ रहा है, तो इसकी जवाबदेही आखिर तय कौन करेगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *