सरकार ने कहा “उपलब्धि”, आंकड़ों ने कहा “सवाल” और जनता अब भी बस टकटकी लगाए देख रही है
नई दिल्ली। खबर बड़ी है, ढोल-नगाड़े भी बड़े हैं। संयुक्त राष्ट्र के ताज़ा अनुमान के मुताबिक 2026 में भारत की आबादी करीब 147.8 करोड़ पहुंच चुकी है, और देश की जीडीपी वृद्धि दर 7.6% से 7.8% के बीच झूल रही है। सरकार ने इसे “वैश्विक अनिश्चितताओं, युद्धों और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं” के बावजूद हासिल की गई एक “बड़ी उपलब्धि” करार दिया है। मंच से भाषण हुआ, तालियां बजीं, चैनलों पर ग्राफिक्स चमके, और रात के प्राइम टाइम में यही “उपलब्धि” चौबीस बार दोहराई गई।

पर तालियों की गूंज के बीच, भीड़ के पिछले हिस्से से एक सीधा-सादा सवाल उठता है “भाई साहब, ये जो जीडीपी बढ़ी है, गई कहां?” यह सवाल पूछने वाला कोई साज़िशकर्ता नहीं है। वह बस वही आम आदमी है, जो हर महीने राशन की दुकान पर बढ़ती कीमतें देखता है, जिसका बेटा डिग्री लेकर नौकरी की लाइन में खड़ा है, और जिसकी जेब पांच साल पहले जितनी ही हल्की है, बल्कि कई बार उससे भी हल्की, क्योंकि परोसने वाला हाथ ऊपर के कुछ लोगों की तरफ ज़्यादा झुका रहता है।
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आइए, इस “बड़ी उपलब्धि” की परत दर परत पड़ताल करते हैं, आंकड़ों के साथ, और थोड़े तंज के साथ भी, क्योंकि कभी-कभी हंसी के बिना सच्चाई निगली नहीं जाती।
भारत की GDP वृद्धि और आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़ों के लिए World Bank की India Development Update रिपोर्ट देखी जा सकती है। World Bank – India Development Update
थाली बड़ी हुई, पर हिस्सा किसे मिला?
सबसे पहले बुनियादी बात। भारत अब दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसका आकार करीब 4.15 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है। शानदार आंकड़ा है, तालियां फिर बजनी चाहिए। पर ज़रा प्रति व्यक्ति आय पर नज़र डालिए, सालाना करीब 2,813 डॉलर, यानी दुनिया की रैंकिंग में 149वां स्थान। मतलब देश की “थाली” तो बड़ी हो गई, पर उस थाली में बैठे हर आदमी के हिस्से का चावल उतना ही रह गया — बल्कि उसकी असली कीमत, महंगाई के आगे, हर साल थोड़ी और घटती जाती है।

और यहीं से असली खेल शुरू होता है। सरकार समझाती है, “जीडीपी बढ़ेगी तो नौकरियां बढ़ेंगी, आय बढ़ेगी, टैक्स वसूली बढ़ेगी, निवेश बढ़ेगा।” यह किताबी अर्थशास्त्र सुनने में बड़ा प्यारा लगता है, जैसे कोई दादी पोते को कहानी सुना रही हो “बड़ा होकर तुम राजा बनोगे बेटा।” पर हकीकत की गली में उतरिए, तो कहानी कुछ और ही निकलती है। राजा तो कोई बन गया, पर वो पोता नहीं था, पड़ोस का कोई और लड़का था, जिसके पास पहले से ही महल था।
संपत्ति की गिनती: थाली का असली गणित
अब बात असली आंकड़ों की। पेरिस स्थित World Inequality Lab की World Inequality Report 2026, जो दिसंबर 2025 में इत्तेफाक से मानवाधिकार दिवस के मौके पर जारी हुई, कहती है:
- देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का करीब 40% हिस्सा है
- शीर्ष 10% के पास 65% संपत्ति है
- आय के मामले में शीर्ष 10% कमाने वाले राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा उठा ले जाते हैं
- निचले 50% लोगों यानी देश की आधी आबादी के हिस्से सिर्फ 15% आय आती है
- यह खाई 2014 से 2024 तक करीब 38 प्रतिशत अंकों पर लगभग जस की तस बनी हुई है
ज़रा इस गणित को ध्यान से पढ़िए। सौ में से दस लोग कमाई का 58 रुपया अपनी जेब में डालते हैं। बाकी पचास लोग, यानी देश की आधी आबादी, मिलकर सिर्फ 15 रुपया आपस में बांटते हैं। बीच में चालीस लोग “मध्यम वर्ग” के तमगे के साथ लटके हुए हैं न पूरी तरह डूबे, न तैरने लायक जगह पा रहे, बस हर महीने EMI और स्कूल फीस के बीच सांस भर रहे हैं।
और सबसे मज़ेदार बात यह है कि यह खाई पिछले दस साल में एक इंच भी नहीं सिकुड़ी। जिस दौर में “विकास” के नारे सबसे ज़ोर से गूंजे, ठीक उसी दौर में अमीर-गरीब की खाई जस की तस बनी रही। कोई कहे तो कहेगा यह महज़ इत्तेफाक है। पर इत्तेफाक इतने साल, इतनी सफाई से कैसे दोहराया जा सकता है?
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रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश के सबसे अमीर तबके पर टैक्स का असरदार बोझ, तनख्वाहदार मध्यम वर्ग से भी कम पड़ता है। यानी जो नौकरीपेशा हर महीने वेतन से टीडीएस कटवाता है, वह अनुपात में उस उद्योगपति से ज़्यादा टैक्स चुका रहा है, जिसकी संपत्ति शेयर बाज़ार में हर तिमाही उछाल मारती है। कमाल की व्यवस्था है जितनी बड़ी दौलत, उतना हल्का बोझ। जैसे किसी को हाथी उठाने के लिए कहा जाए और किसी को चींटी, पर तराज़ू का कांटा फिर भी चींटी वाले की तरफ झुका दिखाया जाए।
वैश्विक तस्वीर भी कम चौंकाने वाली नहीं। दुनिया में अरबपतियों की संख्या पहली बार 3,000 के पार पहुंच गई है। हर चार में से एक इंसान भूख या खाद्य असुरक्षा से जूझ रहा है। शीर्ष 1% अमीर, निचले 50% से औसतन 8,251 गुना ज़्यादा संपत्ति रखते हैं। दुनिया के सिर्फ 60,000 सबसे अमीर लोग, दुनिया की आधी आबादी यानी 4.1 अरब लोगों से तीन गुना ज़्यादा संपत्ति रखते हैं। यह पूरी तस्वीर Oxfam की जनवरी 2026 में दावोस में जारी “Resisting the Rule of the Rich” रिपोर्ट में सामने आई, जिसमें बढ़ती असमानता को दुनिया भर में सत्तावाद बढ़ने से भी जोड़ा गया।
कोविड काल की “उपलब्धि” जब जनता रोई, अरबपति मुस्कुराए
याद कीजिए वह दौर, जब देश महामारी की सबसे बुरी लहर से जूझ रहा था। अस्पतालों में ऑक्सीजन की लाइन लगी थी, श्मशान घाटों पर कतारें थीं, लोग पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलकर अपने गांव लौट रहे थे। और ठीक उसी दौर में, Oxfam India की रिपोर्ट “Survival of the Richest: The India Story” के मुताबिक, देश के अरबपतियों की संपत्ति में 121% की वास्तविक वृद्धि हुई यानी हर दिन करीब 3,608 करोड़ रुपये, हर मिनट करीब 2.5 करोड़ रुपये। इसी दौर में अरबपतियों की संख्या भी 102 से बढ़कर 166 हो गई। सिर्फ 21 अरबपतियों के पास इतनी संपत्ति जमा हो गई, जितनी देश के 70 करोड़ लोगों यानी आधी आबादी के पास मिलाकर भी नहीं थी।
यानी जब देश “सामूहिक तपस्या” के दौर से गुज़र रहा था, कुछ लोग “सामूहिक समृद्धि” के दौर में मस्त थे। इसे कहते हैं असली “आत्मनिर्भरता” बस निर्भरता किस दिशा में बहती है, यह देखने वाली बात है।
अब इसे सरकार “व्यापार-अनुकूल माहौल” कहती है। ठीक है, माहौल तो सचमुच अनुकूल है, पर यह अनुकूलता ठेकों के आवंटन में दिखती है, बैंकों से लोन की सहूलियत में दिखती है, टैक्स छूटों में दिखती है, और नीतियों के हर मोड़ पर उन्हीं चुनिंदा नामों के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है, जिन्हें अखबारों में “उद्योग जगत के दिग्गज” कहा जाता है और सरकारी मंचों पर अगली पंक्ति में बिठाया जाता है। बाकी छोटे व्यापारी, जो GST के फॉर्म भरते-भरते ही थक जाते हैं, “आत्मनिर्भर भारत” की तस्वीर में कहीं कोने में खड़े नज़र आते हैं अगर आते भी हैं तो।
बेरोज़गारी: “उपलब्धि” का दूसरा संस्करण
अब बात रोज़गार की, जो हर सरकार का सबसे प्रिय और सबसे फिसलन भरा विषय है। सरकार के अपने आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़े देखिए किसी विपक्षी दल ने नहीं, खुद मंत्रालय ने जारी किए हैं:
- शहरी बेरोज़गारी दर: 6.7% (अप्रैल-जून 2026)
- ग्रामीण बेरोज़गारी दर: 4.8%, जो तीन तिमाही की गिरावट के बाद फिर से उछली
- कुल श्रम बल भागीदारी दर (LFPR): गिरकर 54.6% पिछली पांच तिमाही का सबसे निचला स्तर
- महिला श्रम बल भागीदारी दर: 34.7% से गिरकर 33.2%
आसान भाषा में समझें तो शहरी बेरोज़गारी सालों से 6.5% से 7% के बीच अटकी हुई है। बीते एक साल के हर महीने और हर तिमाही के आंकड़े उठाकर देख लीजिए, जनवरी 2026 में 6.7% से 7.0%, फरवरी में 6.6%, जनवरी-मार्च तिमाही में 6.6%, अप्रैल-जून में फिर 6.7%। यह कोई सुधरता हुआ ग्राफ नहीं, यह एक ही जगह अटका हुआ कांटा है, जो थोड़ा इधर-उधर डोलकर वापस वहीं आ जाता है।
और अब बड़ी संख्या में लोग नौकरी ढूंढना ही बंद कर रहे हैं। जब लोग नौकरी ढूंढना बंद कर देते हैं, तो वे सरकारी परिभाषा में “बेरोज़गार” की लिस्ट से बाहर हो जाते हैं, क्योंकि “बेरोज़गार” गिनने के लिए ज़रूरी है कि आदमी सक्रिय रूप से नौकरी ढूंढ रहा हो। यानी जितने ज़्यादा लोग हार मानकर घर बैठेंगे, उतना ही “साफ-सुथरा” दिखेगा बेरोज़गारी का आंकड़ा। वाह, क्या जुगाड़ है! ठीक वैसे ही, जैसे किसी परीक्षा में फेल होने से बचने का सबसे आसान तरीका यह हो कि परीक्षा देना ही बंद कर दो, फिर रिपोर्ट कार्ड पर “फेल” नहीं, “अनुपस्थित” लिखा आएगा, और घर में किसी को शक भी नहीं होगा।
बेटियां पढ़ीं, नौकरी नहीं मिली
महिलाओं की स्थिति तो और भी “प्रेरणादायक” कहानी है। जनवरी 2026 में शहरी महिला बेरोज़गारी दर 9.8% तक पहुंच गई थी, जबकि उसी दौर में शहरी पुरुष बेरोज़गारी दर सिर्फ 6.0% थी। मतलब पढ़ी-लिखी बेटियां, इंजीनियरिंग और MBA की डिग्रियां लेकर, इंटरव्यू की लाइन में लगती हैं और खाली हाथ लौटती हैं, जबकि उन्हीं की डिग्रियों के फ्रेम, घर की दीवार पर टंग जाते हैं, “गर्व” के प्रमाण-पत्र की तरह।
एक तरफ “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के होर्डिंग हर चौराहे पर टंगे हैं। दूसरी तरफ बेटी पढ़ भी ले, तो नौकरी की तलाश में हाथ मलती रह जाती है, और अंततः श्रम बाज़ार के आंकड़ों से गायब हो जाती है, जैसे कभी थी ही नहीं। सशक्तिकरण की यह कैसी परिभाषा है, जिसमें सशक्त होकर भी बेटी को घर बैठना पड़े?
आंकड़ों की जादूगरी: “Usual Status” का करिश्मा
सरकार के पास एक और शानदार तरकीब है — आंकड़ों की भाषा बदलने की। PLFS की वार्षिक “Usual Status” रिपोर्ट के मुताबिक सालाना बेरोज़गारी दर सिर्फ 3.2% दिखाई गई है। सुनने में बड़ा सुहाना लगता है, है ना? पर इसका फॉर्मूला ज़रा ध्यान से पढ़िए, अगर किसी व्यक्ति ने साल में सिर्फ 30 दिन भी कोई काम किया हो, चाहे वह ठेले पर सब्ज़ी बेचना हो या दिहाड़ी मज़दूरी, तो उसे “रोज़गार में” गिन लिया जाता है। यानी जो आदमी साल के 335 दिन बेरोज़गार बैठा रहा, पर 30 दिन कहीं मज़दूरी कर आया, वह अब सरकारी आंकड़ों में “नौकरीशुदा नागरिक” है। बधाई हो उसे भी!
जबकि साप्ताहिक आधार (Current Weekly Status) पर, जो असली स्थिति के ज़्यादा करीब है, बेरोज़गारी दर पूरे साल 4.7% से 5.6% के बीच ही घूमती रही यानी कोई बड़ा सुधार नहीं, बस आंकड़ों की भूल-भुलैया में जनता को उलझाए रखने का इंतज़ाम है। नाम बदलो, परिभाषा बदलो, आंकड़ा चमक जाएगा जनता की जेब भले खाली रहे।
गरीबी घटी, पर असमानता क्यों नहीं घटी?
अब सरकार का सबसे प्रिय तर्क सुनिए, “अत्यधिक गरीबी दर घटकर 5.3% रह गई है, हमने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला!” ताली फिर बजनी चाहिए। पर ज़रा इस आंकड़े को असमानता के आंकड़ों के साथ रखकर देखिए।
- मानव विकास सूचकांक (HDI): 0.685 “मध्यम” श्रेणी, 130वां स्थान
- असमानता-समायोजित HDI (IHDI): गिरकर सीधे 0.475 “निम्न” श्रेणी, 120वां स्थान
यह अंतर खुद बता रहा है कि जो थोड़ी बहुत तरक्की हुई भी है, वह कितनी असमान रूप से बंटी है। जैसे ही असमानता का चश्मा लगाया जाता है, भारत का विकास स्कोर एक सीढ़ी नीचे उतर जाता है “मध्यम” से सीधे “निम्न” तक।
- गिनी गुणांक: 25.5, जिसे “निम्न” यानी अपेक्षाकृत बेहतर असमानता का सूचक बताया जा रहा है
पर वही World Inequality Report भारत को दुनिया के सबसे असमान देशों में गिनती है। दो अलग पैमाने, दो अलग कहानियां। जनता किस पर भरोसा करे, यह तय करना उसी का काम छोड़ दिया गया है — वैसे ही जैसे बाकी हर मुश्किल फैसला उसी पर छोड़ दिया जाता है।
- भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक: 100 में से सिर्फ 38 अंक 180 देशों में 96वां स्थान
जिस देश में हर बड़े ठेके, हर बड़ी नीति के पीछे “सेटिंग” की चर्चा आम बात हो, वहां यह अंक कोई हैरानी की बात नहीं। पर हैरानी की बात यह है कि इतने निम्न स्कोर के बावजूद देश के प्रवक्ता हर मंच से “पारदर्शिता का नया युग” जैसे जुमले उछालते नहीं थकते।
खेत में पसीना, बही-खाते में धूल
देश के 44% कामगार आज भी कृषि क्षेत्र में काम करते हैं, पर जीडीपी में कृषि का योगदान सिर्फ 14-17% है। यानी लगभग आधी आबादी, अर्थव्यवस्था के सबसे छोटे हिस्से में जूझ रही है। जबकि सेवा क्षेत्र जहां ज़्यादातर बड़ी पूंजी और बड़े मुनाफे टिके हैं जीडीपी का 54.7% हिस्सा समेटता है, पर उतने अनुपात में रोज़गार नहीं देता।
छोटे और मझोले उद्यम (MSME), जो असल में गांव-कस्बों तक रोज़गार पहुंचाने की रीढ़ हैं, उनमें से सिर्फ 10% को ही औपचारिक बैंक ऋण मिल पाता है बाकी 90% को महंगे, अनौपचारिक कर्ज़ के भरोसे चलना पड़ता है। यानी जिस “जमीनी उद्यमिता” की बात नीति-निर्माता भाषणों में बार-बार करते हैं, उसे असली मदद मिलती ही नहीं, जबकि बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए बैंक कतार लगाकर खड़े रहते हैं। छोटे किसान और छोटे दुकानदार को कर्ज़ के लिए महाजन के पास जाना पड़ता है, और बड़े घराने के लिए बैंक खुद फाइल लेकर दरवाज़े पर पहुंच जाता है।
आंकड़ों की भरमार, पर सवाल वही पुराना
अब ज़रा इन सारे आंकड़ों को एक साथ रखकर देखिए, जैसे किसी जासूसी कहानी में सारे सुराग एक मेज़ पर बिछाए जाते हैं:
- जीडीपी बढ़ रही है 7.6% से 7.8%
- प्रति व्यक्ति आय दुनिया में 149वें स्थान पर
- शहरी बेरोज़गारी सालों से 6.5% से 7% के बीच अटकी
- श्रम बल भागीदारी दर पांच तिमाही के निचले स्तर पर
- शीर्ष 1% के पास 40% संपत्ति
- शीर्ष 10% के पास 58% राष्ट्रीय आय
- निचले 50% के पास सिर्फ 15% आय
- अरबपतियों की संख्या महामारी में 60% से ज़्यादा बढ़ी
- अमीरों पर टैक्स का असरदार बोझ, मध्यम वर्ग से हल्का
- असमानता-समायोजित HDI “निम्न” श्रेणी में
- MSME को कर्ज़ का सिर्फ 10% हिस्सा
इन सारे सुरागों को जोड़कर एक ही कहानी निकलती है यह विकास असल में “सबका साथ” नहीं, “कुछ का साथ, बाकी का इंतज़ार” वाला विकास है। और यह इंतज़ार पिछले दस साल से जारी है, बिना किसी ठोस बदलाव के।
“सबका साथ, सबका विकास” पर किसका विकास पहले?
नारे तो बड़े सुंदर गढ़े जाते हैं। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास।” सुनने में लगता है जैसे कोई सामूहिक यात्रा हो, जिसमें सब एक साथ चल रहे हों। पर आंकड़े बताते हैं कि यह यात्रा किसी लोकल ट्रेन जैसी है, कुछ लोग AC कोच में आराम से सफर कर रहे हैं, और बाकी जनरल डिब्बे के दरवाज़े पर लटककर हवा खा रही है, इस उम्मीद में कि अगला स्टेशन शायद उनका भी हो।
सरकार हर साल बजट में नए वादे करती है गांव-गांव सड़क, हर घर नल, हर हाथ को काम। कुछ वादे पूरे भी हुए हैं, मानना चाहिए। सड़कें बनी हैं, बिजली पहुंची है, कुछ योजनाएं ज़मीन पर उतरी भी हैं। पर सवाल यह है कि जब बुनियादी ढांचा बना, कनेक्टिविटी बढ़ी, डिजिटल इंडिया का डंका बजा, तो उसी दौर में अमीर-गरीब की खाई इतनी चौड़ी क्यों बनी रही? क्या बुनियादी ढांचा सिर्फ उन्हीं तक तेज़ी से पहुंचता है, जिनके पास पहले से गाड़ी है, ताकि वे नई सड़क पर और तेज़ भाग सकें?
टैक्स की कहानी: कंधे किसके, बोझ किसका
आम आदमी का सबसे बड़ा गुस्सा टैक्स को लेकर है, और वह गुस्सा बेवजह नहीं है। जिसकी सैलरी 50 हज़ार रुपये महीना है, उसकी हर पाई का हिसाब सरकार के पास है, टीडीएस कटता है, फॉर्म भरना पड़ता है, रिटर्न फाइल करना पड़ता है, और गलती हुई तो नोटिस आ जाता है। पर जिसकी संपत्ति अरबों में है, उसके लिए टैक्स बचाने के इतने रास्ते हैं कि गिनती करना मुश्किल है, शेल कंपनियां, विदेशी निवेश ढांचे, कैपिटल गेन की छूट, और न जाने क्या-क्या। नतीजा वही, जो World Inequality Report बताती है, सबसे अमीर तबके पर टैक्स का असरदार बोझ, तनख्वाहदार वर्ग से भी कम पड़ता है।
यह ऐसा ही है जैसे किसी मोहल्ले में चंदा इकट्ठा हो रहा हो, और छोटे दुकानदार से पूरे सौ रुपये लिए जाएं, जबकि सबसे बड़े मकान वाले सेठ से “बाद में दे दूंगा” कहकर टाल दिया जाए, और वह “बाद” कभी नहीं आता।
विज्ञापन की चमक, ज़मीन की सच्चाई
सरकारी विज्ञापनों में हर साल नए आंकड़े चमकते हैं, “इतने लाख करोड़ का निवेश आया,” “इतने नए एक्सप्रेसवे बने,” “इतनी नई एयरपोर्ट बनीं।” यह सब सच भी हो सकता है। पर विज्ञापन में यह नहीं बताया जाता कि उस निवेश का फल किसकी झोली में गिरा, वह एक्सप्रेसवे किस ज़मीन के अधिग्रहण से बना और किसानों को मुआवज़ा कितना मिला, और वह नया एयरपोर्ट किस शहर के आम आदमी के काम आया, या सिर्फ बिज़नेस क्लास की उड़ानों के लिए बना एक और चमकदार टर्मिनल भर रहा।
आंकड़ों की चमक और ज़मीन की सच्चाई के बीच का यह फासला ही असली कहानी है, जिसे न सरकारी विज्ञापन बताता है, न प्राइम टाइम की बहस।
तो सवाल आखिर यह है, माननीय…
अब सीधा सवाल, जब जीडीपी 7 से 8% की दर से बढ़ रही है, जब देश दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तो यह पैसा जा कहां रहा है? जवाब आंकड़ों में ही छिपा है, बस उसे पढ़ने की हिम्मत चाहिए।
- जब शीर्ष 1% के पास देश की 40% संपत्ति है, तो “सबका साथ, सबका विकास” किसके साथ है?
- जब शहरी बेरोज़गारी सालों से 6.5% से 7% के बीच अटकी है, तो “रोज़गार सृजन” के दावे किस आधार पर किए जाते हैं?
- जब लाखों महिलाएं श्रम बाज़ार से बाहर होती जा रही हैं, तो “महिला सशक्तिकरण” के होर्डिंग किसके लिए लगाए जाते हैं?
- जब देश के अमीरों पर टैक्स का बोझ, तनख्वाहदार वर्ग से भी हल्का पड़ता है, तो “न्यायसंगत कराधान” की बात किस मुंह से की जाती है?
- जब MSME को कर्ज़ का सिर्फ 10% हिस्सा मिलता है, तो “आत्मनिर्भर भारत” किसकी आत्मनिर्भरता की बात करता है?
- जब असमानता-समायोजित HDI “निम्न” श्रेणी में है, तो “विश्वगुरु” बनने के दावे किस बुनियाद पर टिके हैं?
सरकार से सवाल यह नहीं है कि जीडीपी क्यों बढ़ी? बढ़नी ही चाहिए, बढ़ती रहे। सवाल यह है कि यह वृद्धि किसकी जेब भर रही है, और किसकी जेब खाली छोड़ रही है। सवाल यह है कि आंकड़ों की चमक और जनता की जेब के बीच यह फासला कब तक बना रहेगा, और कौन इसका जवाब देगा।
जवाब देना सरकार का काम है। तालियां बजाना जनता की मजबूरी नहीं, चुनाव है और वह चुनाव अब आंकड़े पढ़कर ही किया जाना चाहिए, भाषण सुनकर नहीं। क्योंकि भाषण में जीडीपी “उपलब्धि” बनकर चमकती है, पर उसी भाषण के पीछे छिपे आंकड़ों में, आम आदमी की जेब आज भी उतनी ही हल्की है, जितनी पांच साल पहले थी, बस ऊपर के कुछ नाम, हर साल थोड़े और भारी होते जा रहे हैं।
जब तक थाली बड़ी होने का फायदा सबको बराबर नहीं मिलता, तब तक “बड़ी उपलब्धि” के नारे सिर्फ माइक पर अच्छे लगते रहेंगे, जनता की जेब में नहीं उतरेंगे। और जब तक जेब में नहीं उतरेंगे, सवाल भी उठते रहेंगे, चाहे कितनी भी तालियां क्यों न बज जाएं।
