हर पेट्रोल पंप पर सवाल एक ही है — टंकी में जा क्या रहा है? जवाब अब भी अधूरा है
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पेट्रोल में मिलाए जा रहे एथेनॉल की मात्रा सार्वजनिक रूप से बताए जाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी की इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें पहले संबंधित हाईकोर्ट का रुख करना चाहिए था। मामला देशभर में लागू हो चुकी सरकार की ई-20 नीति से जुड़ा है, जिसके तहत पेट्रोल में 20% तक एथेनॉल मिलाया जा रहा है। जीडीपी 7.8% बढ़ी, जनता की जेब जस की तस! आखिर यह “विकास” जा किसके घर पहुंच रहा है?
अदालत ने क्या कहा
सोमवार को जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई से ही मना कर दिया। याचिका में मांग थी कि देशभर के पेट्रोल पंपों पर बिकने वाले पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा साफ-साफ बताई जाए। अदालत ने सीधा जवाब दिया — यह मामला सुप्रीम कोर्ट के बजाय पहले हाईकोर्ट में उठाया जाना चाहिए था। पीठ ने याचिकाकर्ता की पेशेवर पृष्ठभूमि पर भी सवाल खड़े किए और उन्हें उचित मंच पर जाने की सलाह देकर मामला निपटा दिया। Supreme Court of India
केंद्र सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी याचिका का पुरज़ोर विरोध किया। उनका कहना था कि यह किसी और मकसद से चलाई जा रही मुकदमेबाज़ी है, और सरकार की एथेनॉल-मिश्रण नीति को चुनौती देने वाली इस तरह की अर्ज़ियां पहले भी खारिज हो चुकी हैं। 129 FIR रद्द, “उपकार” का ढोल पीट रही सरकार! कांग्रेस और राजनितिक पार्टी.. नाटक बंद करो !
याचिकाकर्ता का सीधा सवाल — बस इतना तो बताओ
गोस्वामी का कहना था कि वे नीति पर सवाल नहीं उठा रहे, सिर्फ जानकारी मांग रहे हैं। उनकी दलील थी कि जब रोज़मर्रा के छोटे-मोटे खाद्य पदार्थों की सामग्री तक उपभोक्ता को बताई जाती है, तो गाड़ी में भरे जाने वाले ईंधन की बनावट छुपाई क्यों जाए। याचिका में यह भी लिखा गया कि जब सरकार खुद पूरे देश में एक अनिवार्य बाज़ार खड़ा कर रही हो, तो यह जानकारी महज़ एक दिखावटी नारा नहीं, बल्कि संवैधानिक ज़रूरत बन जाती है।

अदालत ने अंतिम आदेश में याचिका खारिज करते हुए इतनी राहत ज़रूर दी कि याचिकाकर्ता चाहें तो संबंधित अधिकारी के पास अपनी बात रख सकते हैं। यानी सवाल का जवाब अभी भी अधर में लटका है — बस पता करने की जगह बदल गई।
सड़कों पर पहले से चल रही है असली लड़ाई
अदालत का दरवाज़ा भले बंद हुआ हो, पर ई-20 नीति के खिलाफ विरोध थमा नहीं है। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर लगातार अभियान चल रहे हैं, कई लोगों ने सूचना के अधिकार के तहत आवेदन डाले हैं, और एथेनॉल-मुक्त पेट्रोल का विकल्प बनाए रखने की मांग बार-बार उठ रही है।

नीति लागू होने के बाद से गाड़ी मालिकों की शिकायतें भी बढ़ी हैं — इंजन में असामान्य घिसावट, फ्यूल टैंक और कार्ब्यूरेटर में खराबी, फ्यूल लाइन की समस्याएं सामने आ रही हैं। आलोचकों का आरोप है कि तय समय से पांच साल पहले ही यह नीति लागू कर दी गई, जबकि कई वाहन निर्माता अब तक इतने ज़्यादा एथेनॉल मिश्रण के लिए इंजन तैयार ही नहीं कर पाए थे। नतीजा यह कि जो गाड़ियां कम एथेनॉल वाले ईंधन के हिसाब से बनी थीं, उन्हें भी मजबूरन नया मिश्रण झेलना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार का रुख़ बिल्कुल अलग है। सरकार का कहना है कि न तो वाहन निर्माताओं से, न ऑटोमोबाइल संगठनों से और न ही उपभोक्ता समूहों से ऐसी कोई ठोस शिकायत मिली है जो यह साबित करे कि माइलेज घटा है, पिक-अप कमज़ोर हुआ है, या टंकी में जंग लगने जैसी दिक्कतें आई हैं।

नतीजा — सवाल वहीं का वहीं
एक तरफ गाड़ी मालिकों की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं, दूसरी तरफ सरकार के पास इसका कोई आधिकारिक सबूत नहीं मिलने का दावा है। बीच में अटका है वह मूल सवाल, जिसे लेकर याचिका दाखिल हुई थी — टंकी में आखिर जा क्या रहा है, यह जानने का हक़ आम उपभोक्ता को कब मिलेगा। अदालत ने रास्ता खुला बताकर मामला बंद कर दिया है, पर जिस दरवाज़े की तरफ इशारा किया गया है, वहां तक पहुंचने का रास्ता अभी लंबा और अनिश्चित बना हुआ है।
