छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सौंपी CBI जांच, परिवार को 25 लाख मुआवजा, DGP-गृह सचिव की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
रायपुर/दिल्ली। छत्तीसगढ़ में हिरासत में होने वाली मौतों यानी “कस्टोडियल डेथ” के मामलों की लंबी होती फेहरिस्त ने राज्य की पुलिस व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। थानेदार स्तर से लेकर आईपीएस अधिकारियों तक, अवैध कमाई के आरोपों ने अब केंद्रीय जांच एजेंसियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। कस्टोडियल डेथ मामला: 5 बड़े सवाल, CBI जांच से DGP पर संकट?
एक दौर था जब छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के खौफ से जूझ रहा था। नक्सलियों का सफाया तो काफी हद तक हो गया, लेकिन इसके साथ ही राज्य में एक नई तरह की “खाकी वर्दी के खौफ” की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पूछताछ के नाम पर वसूली, गंभीर धाराएं जोड़ने या हटाने के एवज में लेन-देन—इन आरोपों ने कथित तौर पर एक संगठित रैकेट का रूप ले लिया है।

छत्तीसगढ़ भले ही आर्थिक रूप से पिछड़ा राज्य माना जाता हो, लेकिन प्रशासनिक सेवा के कुछ चुनिंदा अधिकारियों की संपत्ति में असामान्य बढ़ोतरी देखी गई है। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ऐसे कई अधिकारियों के ठिकानों पर छापेमारी भी की, लेकिन ठोस नतीजे सामने नहीं आ सके। ऐसे में जांच एजेंसियों को इन अधिकारियों की काली कमाई का सही अंदाजा लगाने में भी खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। इन तमाम मामलों के प्रति गृह मंत्रालय की चुप्पी और बेरुखी न केवल हैरान करने वाली मानी जा रही है, बल्कि जनता के हितों के प्रति सरकार की जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

इसी बीच, सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की प्रति खूब वायरल हो रही है, जिसने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली की परतें खोलकर रख दी हैं। यह मामला है छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में हुई श्रवण सूर्यवंशी की कस्टोडियल डेथ का, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ क्या है पूरा मामला: शराब की मामूली बरामदगी और फिर मौत
बिलासपुर जिले के सीपत थाना क्षेत्र में 18 जनवरी 2024 को श्रवण सूर्यवंशी, जिन्हें सरवन तामरे के नाम से भी जाना जाता है, को छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का आरोप था कि उनके पास करीब 6 लीटर कच्ची महुआ शराब बरामद हुई, जिसकी अनुमानित कीमत मात्र ₹1,200 आंकी गई थी। यानी जिस अपराध के आरोप में गिरफ्तारी हुई, वह मूल्य के हिसाब से बेहद मामूली था। लेकिन आगे जो हुआ, उसने पूरे मामले को एक गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दे में बदल दिया।

गिरफ्तारी के बाद श्रवण सूर्यवंशी को जेल भेज दिया गया। कुछ दिनों बाद जेल में उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। हालत बिगड़ते देख जेल प्रशासन ने 21 जनवरी 2024 को उन्हें बिलासपुर के CIMS अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन इलाज के दौरान 22 जनवरी 2024 की सुबह करीब 6 बजे उनकी मौत हो गई। गिरफ्तारी से मौत तक का यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ चार दिनों के भीतर घट गया, जो अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ : पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आए भयावह तथ्य
श्रवण सूर्यवंशी के पोस्टमार्टम में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, उनके शरीर पर कई जगह चोट के स्पष्ट निशान मौजूद थे। सिर के पिछले हिस्से पर एक गंभीर चोट पाई गई। इसके अलावा कलाई और पैरों पर सूजन के निशान थे, और जांघ व गर्दन के पीछे के हिस्से पर भी चोट के प्रमाण मिले। यह चोटें किसी सामान्य दुर्घटना का नतीजा नहीं लग रही थीं, बल्कि जानबूझकर मारपीट की ओर इशारा कर रही थीं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया—सिर पर किसी सख्त और भारी वस्तु से लगी चोट, और उससे उत्पन्न हुई चिकित्सीय जटिलताएं। इस चिकित्सीय निष्कर्ष ने इस आशंका को और पुख्ता कर दिया कि श्रवण की मौत हिरासत में हुई प्रताड़ना का ही नतीजा थी, न कि किसी प्राकृतिक कारण से।
छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ : हाईकोर्ट का फैसला – हिंसा तो मानी, लेकिन मुआवजा सिर्फ 1 लाख रुपये
कस्टोडियल डेथ मामले की सुनवाई सबसे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में हुई। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह स्वीकार किया कि हिरासत के दौरान श्रवण सूर्यवंशी के साथ हिंसा की गई थी, और यही हिंसा उनकी मौत का कारण बनी। यह अदालत की तरफ से एक बेहद अहम और साफ स्वीकृति थी, जिसने पुलिस प्रशासन की भूमिका पर सीधा सवाल खड़ा किया।
लेकिन इसके बावजूद हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवार को महज ₹1 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। यह रकम, मौत की गंभीरता और परिवार की क्षति को देखते हुए बेहद कम मानी गई। इससे भी अधिक चिंता की बात यह रही कि हाईकोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ न तो कोई FIR दर्ज कराने का आदेश दिया, न ही किसी स्वतंत्र और प्रभावी जांच का रास्ता साफ किया। यानी हिंसा को स्वीकार करने के बावजूद, दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करने वाला कोई आदेश नहीं आया।

परिवार को यह फैसला अन्यायपूर्ण और अधूरा लगा। न्याय की उम्मीद में मृतक की पत्नी और उनकी बेटियों ने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया, ताकि इस मामले में सही मायने में जवाबदेही तय हो सके।
छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ मामला : सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: DGP के जवाब पर भड़का कोर्ट
4 अगस्त 2026 को इस मामले की सुनवाई के दौरान एक बड़ा और अहम घटनाक्रम सामने आया। छत्तीसगढ़ के DGP, DG (जेल) और प्रिंसिपल सेक्रेटरी (गृह) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सीधे सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश होना पड़ा। यह अपने आप में एक असामान्य स्थिति थी, क्योंकि राज्य के तीन सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को खुद अदालत के सामने अपना पक्ष रखना पड़ा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीधा सवाल पूछा कि अब तक जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ FIR क्यों दर्ज नहीं की गई। इसके जवाब में DGP की तरफ से यह कहा गया कि पुलिस को न्यायिक जांच यानी जुडिशियल इंक्वायरी की रिपोर्ट अब तक प्राप्त ही नहीं हुई थी, इसलिए FIR दर्ज करने का सवाल ही नहीं उठता। यह जवाब सुनने में साधारण लग सकता है, लेकिन इसकी सच्चाई जल्द ही उजागर हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने इस जवाब को सुनकर तीखी नाराजगी जाहिर की। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक जांच की रिपोर्ट तो 22 जुलाई 2024 को ही तैयार हो चुकी थी, और यह जानकारी राज्य सरकार के अपने रिकॉर्ड में भी दर्ज थी। यानी अधिकारी करीब दो साल पुरानी एक रिपोर्ट के बारे में अनजान होने का दावा कर रहे थे, जबकि हकीकत में यह रिपोर्ट पहले से ही राज्य के पास मौजूद थी। यह विसंगति कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश जैसी दिखी।
“कवर-अप स्टोरी” सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी स्थिति को “सांविधिक प्रक्रिया के प्रति चिंताजनक उपेक्षा” करार दिया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अधिकारियों की यह दलील असल में एक “कवर-अप स्टोरी” थी, यानी सच्चाई को छिपाने की एक सोची-समझी कोशिश, जिसका मकसद अदालत को गुमराह करना था।
यह टिप्पणी बताती है कि सर्वोच्च अदालत ने राज्य के वरिष्ठतम अधिकारियों के जवाब को कितनी गंभीरता से लिया। आमतौर पर अदालतें प्रशासनिक अधिकारियों के बयानों पर भरोसा करती हैं, लेकिन इस मामले में जब रिकॉर्ड और बयान में साफ विरोधाभास सामने आया, तो कोर्ट ने बिना किसी लाग-लपेट के इसे झूठ और गुमराह करने की कोशिश करार दे दिया। यह छत्तीसगढ़ प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य की न्याय व्यवस्था और सरकारी मशीनरी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ केस की जांच करेगी CBI: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देश
अधिकारियों के रवैये से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच अब केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी है। कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

- CBI को तत्काल एक नियमित आपराधिक मामला (रेगुलर केस) दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।
- इस जांच की जिम्मेदारी किसी वरिष्ठ CBI अधिकारी को सौंपी जाएगी, ताकि जांच में पर्याप्त अनुभव और गंभीरता सुनिश्चित हो सके।
- हिरासत में हुई मौत की परिस्थितियों की गहराई से जांच होगी, जिसमें यह पता लगाया जाएगा कि श्रवण के साथ किन हालात में हिंसा हुई और इसमें कौन-कौन शामिल था।
- कस्टोडियल हिंसा के लिए जो भी अधिकारी दोषी पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कानून के मुताबिक अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) चलाया जाएगा।
- राज्य के अधिकारियों ने न्यायिक जांच रिपोर्ट मिलने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं की, इस पहलू की भी जांच CBI करेगी। यानी जांच सिर्फ मौत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर हुई देरी और लापरवाही की भी पड़ताल होगी।
- छत्तीसगढ़ के DGP को एक सप्ताह के भीतर मामले से जुड़ा पूरा रिकॉर्ड CBI निदेशक को सौंपने का निर्देश दिया गया है।

यह आदेश इस मायने में बेहद अहम है कि इसमें न सिर्फ मूल घटना यानी कस्टोडियल डेथ की जांच की बात है, बल्कि यह भी जांचा जाएगा कि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही जानबूझकर की गई या यह सिर्फ सिस्टम की खामी थी। इससे यह भी साफ होता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को सिर्फ एक अकेली घटना के तौर पर नहीं, बल्कि व्यवस्थागत जवाबदेही के मसले के तौर पर देख रहा है।
छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ केस में पीड़ित परिवार को अंतरिम राहत के तौर पर 25 लाख रुपये
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए ₹1 लाख के मुआवजे को पूरी तरह नाकाफी मानते हुए इसे बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया है। यह राशि फिलहाल अंतरिम राहत के तौर पर दी जा रही है, यानी अंतिम मुआवजे की रकम आगे तय की जाएगी और यह ₹25 लाख अंतिम आंकड़ा नहीं है।

कोर्ट ने आदेश दिया है कि यह ₹25 लाख की राशि चार सप्ताह के भीतर मृतक श्रवण सूर्यवंशी की पत्नी लह्रा बाई तामरे के बैंक खाते में जमा की जाए। यह कदम इस बात का साफ संकेत है कि सुप्रीम कोर्ट पीड़ित परिवार को तुरंत आर्थिक राहत पहुंचाना चाहता है, भले ही न्यायिक प्रक्रिया और अंतिम फैसला आने में अभी लंबा समय लगे। अदालत का यह रुख इस बात का भी उदाहरण है कि गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में पीड़ितों को तुरंत राहत देना कितना जरूरी माना जाता है।
आदेश का असर: वरिष्ठ अधिकारियों पर गंभीर सवाल
इस पूरे आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ जांच CBI को सौंपी है, बल्कि राज्य के तीन बड़े अधिकारियों DGP, DG (जेल) और प्रिंसिपल सेक्रेटरी (होम) की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत का यह रुख बताता है कि मामला सिर्फ एक कस्टोडियल डेथ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की भी बड़ी परीक्षा हो रही है।

गौर करने वाली बात यह है कि जब राज्य के सबसे वरिष्ठ अधिकारी खुद सुप्रीम कोर्ट के सामने गलत जानकारी देते नजर आएं, तो यह सिर्फ एक व्यक्तिगत चूक नहीं मानी जा सकती। यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। साथ ही, तस्दीक की जाती है कि खाकी वर्दी वाले अधिकारी हों या फिर टाई वाले प्रशासनिक अधिकारी, इन मामलों में दोनों की कार्यप्रणाली उगाही और लापरवाही के मामलों में एक-दूसरे से मेल खाती दिख रही है।
छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ: एक बड़ी और चिंताजनक समस्या
श्रवण सूर्यवंशी का मामला अकेला नहीं है। छत्तीसगढ़ में कस्टोडियल डेथ यानी हिरासत में मौत के मामलों की एक लंबी फेहरिस्त मौजूद है, जो राज्य की पुलिस व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े करती रही है। इन मामलों में अक्सर देखा गया है कि पुलिस हिरासत में मौत के बाद जांच धीमी गति से चलती है, या फिर मामला बिना किसी ठोस नतीजे के ठंडे बस्ते में चला जाता है।
यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संस्था खुद हस्तक्षेप करती है और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसी को जांच सौंपती है, तो यह पीड़ित परिवारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आता है। साथ ही, यह राज्य सरकार के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि इस तरह के मामलों में लापरवाही या ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अब आगे क्या? राज्य सरकार की भूमिका पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के सामने आए करीब 10 दिन बीत चुके हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने को लेकर राज्य सरकार का रवैया अब तक ढुलमुल नजर आ रहा है। सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ की मौजूदा बीजेपी सरकार इस मसले पर सर्वोच्च अदालत की गंभीरता से सीख लेकर कड़ा एक्शन लेगी, या फिर मामला यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की स्थिति में ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
यह देखना भी अहम होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का किस तरह से परिपालन सुनिश्चित किया जाता है। क्या DGP तय समयसीमा के भीतर CBI को पूरा रिकॉर्ड सौंप देते हैं? क्या CBI तुरंत नियमित मामला दर्ज कर जांच शुरू कर देती है? और सबसे अहम, क्या पीड़ित परिवार को समय पर ₹25 लाख की अंतरिम राशि मिल पाती है?
छत्तीसगढ़ कस्टोडियल डेथ केस: न्याय की उम्मीद और जवाबदेही का सवाल
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि CBI की जांच कितनी तेजी से आगे बढ़ती है, DGP द्वारा रिकॉर्ड सौंपे जाने की समयसीमा का कितना पालन होता है, और पीड़ित परिवार को कब तक वास्तविक न्याय मिल पाता है। छत्तीसगढ़ में कस्टोडियल डेथ के मामलों की लंबी सूची को देखते हुए, यह फैसला आगे की जांच प्रक्रियाओं के लिए एक मिसाल बन सकता है. बशर्ते इसका ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ पालन हो।
श्रवण सूर्यवंशी का मामला अब सिर्फ एक परिवार के न्याय की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पूरी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही तय करने वाला एक अहम केस बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप बताता है कि जब राज्य स्तर पर न्याय अधूरा या कमजोर रह जाता है, तो सर्वोच्च अदालत आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आ सकती है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि CBI की जांच किस दिशा में जाती है और क्या वाकई इस मामले में दोषी अधिकारियों को कानून के दायरे में लाया जा पाता है।
यह रिपोर्ट उपलब्ध जानकारी और सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित है।
