दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे वयस्क कपल को पुलिस सुरक्षा दी। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता और रिश्तेदार उनकी पसंद में दखल नहीं दे सकते।
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी और सहमति से साथ रह रहे हैं, तो माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त उनकी जिंदगी में जबरदस्ती दखल नहीं दे सकते। किसी को भी ऐसे कपल को डराने, धमकाने या उनकी जान को खतरे में डालने का हक नहीं है। कोर्ट ने परिवार की ओर से धमकी का सामना कर रहे एक कपल को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश भी दिया है। DELHI SIR: 47 लाख नाम बाहर! 24 अगस्त को खुलेगा वोटर लिस्ट का बड़ा राज

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 13 अगस्त को इस मामले में आदेश दिया। याचिका लगाने वाले दोनों लोग 30 साल से ज्यादा उम्र के हैं। दोनों ने कोर्ट को बताया कि वे कुछ समय से साथ रह रहे हैं और आगे एक-दूसरे से शादी भी करना चाहते हैं। लेकिन लड़की के पिता और भाई इस रिश्ते से खुश नहीं थे। कपल का आरोप था कि परिवार की ओर से उन्हें लगातार हिंसा की धमकी दी जा रही थी। कपल ने पहले स्थानीय थाने में शिकायत की थी। जब उन्हें वहां से राहत नहीं मिली तो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने मामले को देखते हुए उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस को जरूरी कदम उठाने को कहा।
अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं तो कोई नहीं रोक सकता
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग लोग अपनी इच्छा और सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, तो किसी दूसरे व्यक्ति को उनके फैसले में जबरदस्ती दखल देने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने माता-पिता, रिश्तेदार और दोस्तों का भी साफ तौर पर जिक्र किया। अदालत ने कहा कि परिवार का सदस्य होने के कारण किसी को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह किसी बालिग की पसंद को जबरदस्ती बदल दे।
दिल्ली हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट
अगर माता-पिता को अपने बेटे या बेटी के रिश्ते से परेशानी है तो वे अपनी बात रख सकते हैं। वे समझा सकते हैं और अपनी चिंता बता सकते हैं। लेकिन धमकी देना, मारपीट करना या जान को खतरा पैदा करना किसी भी हालत में सही नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपनी मर्जी से एक साथ रहने का फैसला किया है। ऐसे में उनकी जान और आजादी की रक्षा करना जरूरी है।
क्या है लिव-इन रिलेशनशिप का पूरा मामला?
यह मामला 30 साल से ज्यादा उम्र के एक कपल से जुड़ा है। दोनों काफी समय से एक साथ रह रहे हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि वे अपनी मर्जी से साथ हैं और आगे शादी करने का भी इरादा रखते हैं। लेकिन महिला के पिता और भाई इस रिश्ते के खिलाफ थे। याचिका में बताया गया कि परिवार की ओर से दोनों को लगातार धमकियां मिल रही थीं। कपल को डर था कि उनके साथ कोई गलत घटना हो सकती है।
इसके बाद दोनों ने स्थानीय पुलिस से संपर्क किया। उन्होंने थाने में शिकायत देकर सुरक्षा की मांग की। उनका कहना था कि परिवार की ओर से मिल रही धमकियों के कारण वे परेशान हैं। जब पुलिस से अपेक्षित मदद नहीं मिली तो कपल ने हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने अदालत से अपनी जान और आजादी की सुरक्षा की मांग की।
लड़की के पिता और भाई पर क्या आरोप?
कपल ने आरोप लगाया कि लड़की के पिता और भाई इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर रहे थे। दोनों कथित तौर पर कपल को साथ रहने से रोकना चाहते थे। याचिका के मुताबिक, विरोध सिर्फ नाराजगी तक सीमित नहीं था। कपल ने आरोप लगाया कि उन्हें हिंसा की धमकी भी दी जा रही थी।
यही वजह थी कि दोनों ने पुलिस से सुरक्षा मांगी।
उनका कहना था कि अगर परिवार की ओर से धमकियां जारी रहीं तो उनकी जान को खतरा हो सकता है। कोर्ट के सामने जब यह बात आई तो अदालत ने यह नहीं कहा कि परिवार को अपनी राय रखने का अधिकार नहीं है। कोर्ट का जोर इस बात पर था कि राय और असहमति अपनी जगह है, लेकिन धमकी और हिंसा की इजाजत नहीं दी जा सकती।
लिव-इन रिलेशनशिप : कोर्ट ने कपल को पुलिस सुरक्षा दी
मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने कपल को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने माना कि अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं और उन्हें किसी से खतरा है, तो उनकी सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पुलिस की जिम्मेदारी है कि किसी व्यक्ति की जान और सुरक्षा को खतरा होने पर जरूरी कदम उठाए जाएं। यही वजह है कि अदालत ने मामले में सुरक्षा देने का निर्देश दिया। इस आदेश से साफ है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले किसी कपल को सिर्फ उनके रिश्ते की वजह से धमकाया नहीं जा सकता। अगर उन्हें असली खतरा है और वे पुलिस के पास शिकायत करते हैं, तो उनकी शिकायत पर ध्यान देना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा- शादी नहीं हुई, फिर भी आजादी का अधिकार है
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं की अभी शादी नहीं हुई है। वे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। लेकिन दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साथ रह रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस वजह से कि दोनों की शादी नहीं हुई है, उनकी आजादी कम नहीं हो जाती। अदालत ने उनके रिश्ते को शादी के समान बताते हुए उनके साथ रहने के अधिकार पर जोर दिया।

यहां कोर्ट की बात मुख्य रूप से उनकी अपनी पसंद से साथ रहने और सुरक्षा से जुड़ी थी। इसका मतलब यह नहीं है कि शादी और लिव-इन रिलेशनशिप हर कानून में बिल्कुल बराबर हो गए हैं। दोनों के बीच कानूनी फर्क हो सकता है। लेकिन किसी बालिग व्यक्ति की अपनी पसंद से किसी के साथ रहने की आजादी को केवल शादी नहीं होने के कारण खत्म नहीं किया जा सकता।
परिवार की नाराजगी अपनी जगह, लेकिन धमकी गलत
परिवार को अपने बच्चों के रिश्ते से नाराजगी हो सकती है। माता-पिता को लग सकता है कि उनका बेटा या बेटी गलत फैसला ले रहा है। ऐसी स्थिति में वे समझा सकते हैं और अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन समझाने और धमकाने में बहुत बड़ा फर्क है। अगर कोई बालिग अपनी मर्जी से किसी के साथ रहना चाहता है तो परिवार उसे अपनी बात समझा सकता है।
लेकिन अगर परिवार मारपीट, डराने या धमकी का रास्ता अपनाता है तो मामला अलग हो जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी फर्क को साफ किया है। लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे किसी कपल को परिवार पसंद नहीं करता, यह अलग बात है। लेकिन उन्हें नुकसान पहुंचाने की धमकी देना अलग बात है। किसी भी व्यक्ति की जान और सुरक्षा सबसे जरूरी है।
कोर्ट ने जाति और धर्म को लेकर भी कही बड़ी बात
इस मामले में अदालत ने सिर्फ लिव-इन रिलेशनशिप की बात नहीं की। कोर्ट ने जाति, धर्म, रंग, पंथ और आस्था के आधार पर लोगों की पसंद को रोकने की कोशिश पर भी बात की। अदालत ने कहा कि अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी से शादी करते हैं तो केवल जाति, धर्म या दूसरे सामाजिक कारणों से उनकी शादी को मान्यता से वंचित नहीं किया जा सकता।

भारत में कई बार अलग जाति या अलग धर्म के लोगों के रिश्तों का परिवार विरोध करता है। ऐसे मामलों में भी अदालतों ने कई बार बालिग लोगों की मर्जी को महत्व दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सामाजिक सोच और लोगों की निजी राय के आधार पर किसी के मौलिक अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता। यह बात लिव-इन रिलेशनशिप के मामलों में भी काफी अहम है, क्योंकि ऐसे रिश्तों को लेकर परिवार और समाज में अलग-अलग सोच हो सकती है।
समाज क्या कहेगा, इसके नाम पर रोक नहीं
कई परिवार अपने बच्चों के रिश्ते को लेकर यह सोचते हैं कि समाज क्या कहेगा। कई बार इसी डर के कारण बच्चे अपनी पसंद के फैसले नहीं ले पाते। लेकिन कोर्ट ने कहा कि समाज की सोच के नाम पर किसी की आजादी नहीं छीनी जा सकती।
अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं तो समाज के कुछ लोगों को उनका रिश्ता पसंद नहीं है, यह उन्हें डराने या अलग करने का कारण नहीं बन सकता। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज में किसी की राय अच्छी हो सकती है और किसी की राय खराब। लेकिन कानून की नजर में किसी व्यक्ति की जान और आजादी की कीमत किसी सामाजिक सोच से कम नहीं हो जाती।
लिव-इन रिलेशनशिप मामलें में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में कह चुका है कि बालिग लोगों को अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार है। किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए जबरदस्ती अलग नहीं किया जा सकता कि उसका रिश्ता परिवार को पसंद नहीं है। इसी सोच को दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आगे रखा।
अदालत ने कहा कि शादी न होने के बावजूद बालिग लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार एक-दूसरे के साथ रहने का अधिकार है। इससे यह बात साफ होती है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिग लोगों के साथ भी उनकी मर्जी और सुरक्षा के हिसाब से व्यवहार होना चाहिए।
घरेलू हिंसा कानून का भी जिक्र
कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का भी जिक्र किया। इस कानून में महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कई प्रावधान हैं। कानून में कुछ ऐसे रिश्तों को भी सुरक्षा दी गई है जो शादी जैसे रिश्ते की तरह हों।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर लिव-इन रिलेशनशिप को कानून की नजर में शादी मान लिया गया है। किसी मामले में कौन सा कानून लागू होगा, यह उस मामले की पूरी स्थिति पर निर्भर करता है। लेकिन कानून में शादी के अलावा कुछ रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को भी सुरक्षा देने की व्यवस्था है।
क्या हर लिव-इन कपल को पुलिस सुरक्षा मिलेगी?
यह समझना भी जरूरी है कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर लिव-इन रिलेशनशिप वाले कपल को पुलिस सुरक्षा मिल जाएगी।
पुलिस सुरक्षा का फैसला मामले की स्थिति देखकर किया जाता है।
अगर किसी व्यक्ति को जान का खतरा है, धमकी मिल रही है या हिंसा की आशंका है तो वह पुलिस से मदद मांग सकता है। इस मामले में कपल ने परिवार की ओर से धमकी मिलने की बात कही थी। उन्होंने पहले पुलिस में शिकायत भी की थी। इसके बाद वे हाईकोर्ट पहुंचे। इसी वजह से कोर्ट ने उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस को जरूरी कदम उठाने का आदेश दिया।
लिव-इन रिलेशनशिप : क्या परिवार बच्चों को समझा सकता है?
बिल्कुल। माता-पिता अपने बच्चों को समझा सकते हैं। वे अपनी चिंता बता सकते हैं। वे यह भी कह सकते हैं कि उन्हें किसी रिश्ते से क्यों परेशानी है। लेकिन समझाने और जबरदस्ती करने में फर्क है।
मान लीजिए कोई लड़की या लड़का 18 साल से ज्यादा उम्र का है और वह अपनी मर्जी से किसी के साथ रहना चाहता है। परिवार उसके फैसले से सहमत नहीं है। ऐसी स्थिति में परिवार बातचीत कर सकता है, समझा सकता है और अपनी राय दे सकता है। लेकिन मारपीट या धमकी का सहारा नहीं लिया जा सकता। यही बात दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में साफ की है।
बालिग होने का मतलब क्या है?
इस मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र 30 साल से ज्यादा बताई गई है। यानी वे खुद अपनी जिंदगी के फैसले लेने की उम्र में हैं।
कानून में बालिग व्यक्ति के अपने फैसले का महत्व होता है। वह अपने जीवन को लेकर कई फैसले खुद कर सकता है। साथी के साथ रहना भी निजी जिंदगी से जुड़ा फैसला है।
इसलिए अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं तो केवल परिवार की नाराजगी की वजह से उन्हें जबरदस्ती अलग करने की कोशिश नहीं की जा सकती।
क्या लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी है?
भारत में दो बालिग लोगों का अपनी मर्जी से साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं है। अदालतों ने कई मामलों में बालिग लोगों के साथ रहने की आजादी को माना है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हर लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के बराबर माना जाता है। विवाह और लिव-इन रिश्ते की कानूनी स्थिति अलग-अलग हो सकती है। संपत्ति, बच्चों, अलग होने और दूसरे मामलों में अलग कानून लागू हो सकते हैं। इसलिए इस फैसले को सिर्फ इतना समझना चाहिए कि दो बालिग लोगों की अपनी मर्जी से साथ रहने की आजादी और उनकी सुरक्षा का सम्मान किया जाना चाहिए।
अगर लिव-इन रिलेशनशिप वाले कपल को परिवार से खतरा हो तो क्या करे?
अगर लिव-इन रिलेशनशिप में किसी बालिग कपल को अपने परिवार या किसी दूसरे व्यक्ति से जान का खतरा है तो वह सबसे पहले पुलिस से शिकायत कर सकता है। शिकायत में खतरे की पूरी जानकारी देना जरूरी है। अगर पुलिस से मदद नहीं मिलती और खतरा बना रहता है तो व्यक्ति अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकता है। इस मामले में भी कपल ने पहले पुलिस से शिकायत की और बाद में हाईकोर्ट पहुंचे। अदालत ने उनकी बात सुनी और सुरक्षा के लिए पुलिस को निर्देश दिया।
कोर्ट ने आजादी के साथ जिम्मेदारी की भी बात रखी
अपनी पसंद से जीवन जीना एक अधिकार है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। अगर कोई व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है तो दोनों लोगों के बीच आपसी सहमति और सम्मान होना जरूरी है। किसी भी रिश्ते में जबरदस्ती, मारपीट या डराने की जगह नहीं होनी चाहिए। दोनों लोगों को एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। कोर्ट का यह फैसला सिर्फ परिवार के लिए संदेश नहीं है। यह उन लोगों के लिए भी संदेश है जो अपनी पसंद से साथ रहना चाहते हैं।
शादी और लिव-इन रिलेशनशिप में क्या फर्क है?
इस फैसले को समझते समय शादी और लिव-इन रिलेशनशिप के बीच फर्क समझना जरूरी है। शादी एक कानूनी रिश्ता है, जिसके लिए अलग नियम हैं। लिव-इन में दो लोग बिना शादी किए साथ रह सकते हैं। दोनों रिश्तों में कुछ अधिकार और जिम्मेदारियां अलग हो सकती हैं। लेकिन अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं तो उन्हें सिर्फ इसलिए डराया नहीं जा सकता कि उन्होंने शादी नहीं की है। यही वजह है कि कोर्ट ने इस मामले में कपल की आजादी और सुरक्षा को महत्व दिया।
लिव-इन रिलेशनशिप मामले पर कोर्ट का संदेश परिवारों के लिए
दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश से परिवारों के लिए भी एक सीधा संदेश निकलता है। अगर आपका बेटा या बेटी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रह रहा है जिसे आप पसंद नहीं करते, तो पहले बातचीत का रास्ता अपनाएं। आप अपनी परेशानी बता सकते हैं। आप अपने बच्चे को समझा सकते हैं। लेकिन गुस्से में आकर धमकी देना या हिंसा करना सही नहीं है। अगर मामला गंभीर है तो कानून का सहारा लिया जा सकता है। लेकिन किसी की जान को खतरे में डालना किसी भी हालत में सही रास्ता नहीं है।
लिव-इन रिलेशनशिप पर युवाओं के लिए क्या संदेश?
युवाओं के लिए भी यह फैसला जरूरी है। अगर वे अपनी पसंद से किसी के साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें अपने फैसले की जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए। रिश्ता सिर्फ पसंद से नहीं चलता। इसमें भरोसा, सम्मान, जिम्मेदारी और एक-दूसरे की सहमति भी जरूरी है।
अगर परिवार से विरोध हो तो बात करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर जान का खतरा हो तो पुलिस से मदद लेनी चाहिए।
क्या लिव-इन रिलेशनशिप में माता-पिता को कोई अधिकार नहीं?
ऐसा कहना सही नहीं होगा। माता-पिता अपने बच्चों की चिंता कर सकते हैं। वे अपनी राय दे सकते हैं। वे यह भी कह सकते हैं कि उन्हें किसी रिश्ते से क्यों परेशानी है। लेकिन अगर बच्चा बालिग है और अपनी मर्जी से किसी के साथ रह रहा है, तो माता-पिता उसकी जिंदगी का फैसला जबरदस्ती नहीं कर सकते। यही अंतर लिव-इन रिलेशनशिप वाले इस मामले में सबसे अहम है।
कोर्ट ने ‘मौलिक अधिकार’ पर क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सोच और पुराने विचारों के कारण किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार कम नहीं किए जा सकते।
आसान भाषा में इसका मतलब है कि समाज में किसी रिश्ते को लेकर लोगों की अपनी सोच हो सकती है, लेकिन उस सोच के कारण किसी बालिग की आजादी खत्म नहीं की जा सकती। किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के कारण डराया या धमकाया नहीं जा सकता।
जाति के नाम पर रिश्ते का विरोध
भारत में अलग जाति के लोगों के रिश्तों को लेकर कई बार परिवारों में विरोध देखने को मिलता है। अदालत ने कहा कि सिर्फ जाति अलग होने की वजह से बालिग लोगों की पसंद को गलत नहीं कहा जा सकता। अगर दोनों लोग अपनी मर्जी से साथ रहना या शादी करना चाहते हैं तो उनकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए। इसी तरह धर्म के आधार पर भी किसी बालिग की पसंद पर जबरदस्ती रोक नहीं लगाई जा सकती।
लिव-इन रिलेशनशिप : धर्म के नाम पर भी दबाव नहीं
कोर्ट ने धर्म और आस्था का भी जिक्र किया। इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति के निजी फैसले को सिर्फ उसके धर्म या दूसरे व्यक्ति के धर्म के आधार पर जबरदस्ती नहीं बदला जा सकता। भारत में अलग धर्म के लोगों के रिश्तों को लेकर भी कई बार परिवारों में विवाद होता है।
ऐसे मामलों में भी अगर दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से रिश्ता रखना चाहते हैं तो उनकी जान और आजादी की सुरक्षा जरूरी है।
सामाजिक सोच बदल रही है
आज के समय में रिश्तों को लेकर लोगों की सोच पहले से अलग हो रही है। कुछ लोग शादी से पहले साथ रहने को स्वीकार करते हैं तो कुछ लोग इसे पसंद नहीं करते। समाज में अलग-अलग राय होना सामान्य है। लेकिन अदालत का काम यह देखना है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन न हो। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसी बात को सामने रखती है कि निजी पसंद और सुरक्षा को केवल सामाजिक दबाव के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या यह फैसला सभी राज्यों में लागू होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश दिल्ली में सामने आए एक खास मामले से जुड़ा है। लेकिन इसमें बताई गई कानूनी सोच को दूसरे मामलों में भी अदालतें अपने सामने आने वाले तथ्यों के हिसाब से देख सकती हैं। हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए किसी भी मामले में अदालत का फैसला उसकी स्थिति के अनुसार होगा। फिर भी यह आदेश लिव-इन रिलेशनशिप और बालिग लोगों की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण बात सामने रखता है।
कोर्ट ने किस बात को सबसे ज्यादा महत्व दिया?
इस पूरे मामले में तीन बातें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। पहली- दोनों लोग बालिग हैं। दूसरी- दोनों अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं। तीसरी- उन्हें परिवार की ओर से खतरे की शिकायत थी। इन बातों को देखते हुए कोर्ट ने उनकी सुरक्षा को जरूरी माना।
क्या परिवार कपल को जबरदस्ती अलग कर सकता है?
अगर दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं तो परिवार केवल अपनी इच्छा के आधार पर उन्हें जबरदस्ती अलग नहीं कर सकता।
परिवार को अपनी बात कहने और समझाने का अधिकार हो सकता है, लेकिन हिंसा या धमकी का सहारा लेना गलत है। इसी बात को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दोहराया है।
कोर्ट ने पुलिस को क्या संदेश दिया?
इस मामले में कोर्ट ने पुलिस को कपल की सुरक्षा का ध्यान रखने को कहा। जब कोई व्यक्ति अपनी जान को खतरा बताकर पुलिस से मदद मांगता है तो उसकी शिकायत को गंभीरता से लेना जरूरी है। अगर किसी मामले में खतरा सही पाया जाता है तो पुलिस को सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए।
इस फैसले की सबसे बड़ी बात क्या है?
इस फैसले की सबसे बड़ी बात यही है कि किसी बालिग की अपनी जिंदगी और रिश्ते को लेकर पसंद को सिर्फ इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि परिवार उससे खुश नहीं है। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले इस कपल ने अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला किया था। दोनों आगे शादी करना चाहते थे। परिवार के विरोध और कथित धमकी के बाद उन्होंने पुलिस और फिर कोर्ट की मदद ली।
10 सवाल-जवाब में समझिए पूरा मामला
सवाल: कपल की उम्र कितनी थी?
जवाब: दोनों की उम्र 30 साल से ज्यादा बताई गई है।
सवाल: दोनों क्या कर रहे थे?
जवाब: दोनों अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे।
सवाल: क्या वे शादी करना चाहते थे?
जवाब: हां, उन्होंने कोर्ट को बताया कि वे आगे शादी करना चाहते हैं।
सवाल: परिवार को क्या परेशानी थी?
जवाब: लड़की के पिता और भाई इस रिश्ते से खुश नहीं थे।
सवाल: कपल ने क्या आरोप लगाया?
जवाब: दोनों ने परिवार की ओर से धमकी मिलने की बात कही।
सवाल: पहले कहां शिकायत की गई?
जवाब: स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत की गई थी।
सवाल: फिर कोर्ट क्यों गए?
जवाब: पुलिस से अपेक्षित मदद नहीं मिलने के बाद कपल ने हाईकोर्ट में सुरक्षा मांगी।
सवाल: कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
जवाब: कोर्ट ने कपल को पुलिस सुरक्षा देने का निर्देश दिया।
सवाल: क्या हर लिव-इन कपल को सुरक्षा मिलेगी?
जवाब: नहीं, सुरक्षा मामले की स्थिति और खतरे को देखकर दी जाती है।
दिल्ली हाईकोर्ट का लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर यह आदेश काफी अहम है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं तो उनके परिवार, रिश्तेदार या दोस्त उनकी जिंदगी में जबरदस्ती दखल नहीं दे सकते।
इस मामले में दोनों की उम्र 30 साल से ज्यादा थी। दोनों काफी समय से साथ रह रहे थे और आगे शादी करना चाहते थे। लेकिन लड़की के पिता और भाई इस रिश्ते के खिलाफ थे। कपल ने आरोप लगाया कि उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही थीं।
कपल ने पहले पुलिस से शिकायत की। जब वहां से राहत नहीं मिली तो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका लगाई। कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और पुलिस को उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ शादी नहीं होने की वजह से दोनों की आजादी खत्म नहीं हो जाती। वे बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं। इसलिए उनकी जान और आजादी की रक्षा जरूरी है।
लिव-इन रिलेशनशिप और शादी हर कानून में एक जैसे नहीं हैं, लेकिन दोनों में रहने वाले बालिग लोगों की जान और सुरक्षा की अहमियत कम नहीं होती। अगर किसी कपल को धमकी मिलती है तो वह पुलिस से मदद मांग सकता है और जरूरत पड़ने पर कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकता है। यानी दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि रिश्ता परिवार को पसंद हो या नहीं, किसी बालिग कपल को डराने, धमकाने या नुकसान पहुंचाने की इजाजत किसी को नहीं है।
