कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं। कंदाड़ी गांव में गर्भवती महिला की नाव से नदी पार करते समय मौत, एंबुलेंस और पुल पर उठे सवाल।
कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा ब्लॉक से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कंदाड़ी गांव की तीन माह की गर्भवती महिला सुलाता जाड़े की तबीयत बिगड़ने के बाद परिजन उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जा रहे थे। गांव से बाहर निकलने के लिए परिजनों को पहले महिला को खाट पर लेकर नदी तक जाना पड़ा और फिर लकड़ी की नाव से कोटरी नदी पार करनी पड़ी। इसी दौरान नदी की मझधार में महिला की मौत हो गई।
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घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि दुर्गम इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए आपात स्थिति में स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसानी से उपलब्ध है। कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था में अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र और सरकारी योजनाएं होने के बावजूद अगर मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने में नदी और नाव सबसे बड़ी बाधा बन जाएं, तो व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
16 अगस्त से बिगड़ रही थी तबीयत
परिजनों के मुताबिक सुलाता जाड़े की तबीयत 16 अगस्त से खराब थी। घर पर इलाज के बाद भी उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। 17 अगस्त को तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर परिवार ने उसे अस्पताल ले जाने की तैयारी की।
परिजनों ने 102 महतारी एक्सप्रेस से संपर्क करने की कोशिश की। परिवार का कहना है कि समय पर मदद नहीं मिल पाने के कारण उन्हें खुद महिला को अस्पताल पहुंचाने की कोशिश करनी पड़ी। हालांकि एंबुलेंस से जुड़े पूरे घटनाक्रम की आधिकारिक स्थिति जांच के बाद ही साफ होगी।
यहीं से कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती सामने आती है। किसी गर्भवती महिला की हालत बिगड़ने पर समय पर एंबुलेंस और सुरक्षित परिवहन मिलना बेहद जरूरी है। लेकिन दुर्गम गांव में सड़क और नदी की समस्या के कारण यह सुविधा मरीज तक पहुंचने से पहले ही अटक जाती है।

खाट पर महिला को लेकर पहुंचे नदी तक
महिला की हालत बिगड़ने के बाद परिजनों ने उसे खाट पर लिटाया और गांव से नदी तक लेकर पहुंचे। यह दृश्य ग्रामीण इलाकों की कठिन परिस्थितियों को समझने के लिए काफी है।
अस्पताल पहुंचने के लिए सिर्फ वाहन की जरूरत नहीं थी। उससे पहले नदी पार करना जरूरी था। कोटरी नदी के दूसरे किनारे तक जाने के लिए लकड़ी की नाव का सहारा लिया गया।
परिजन महिला को नाव से नदी पार करा रहे थे। इसी दौरान उसकी हालत और बिगड़ गई। नदी की मझधार में ही महिला ने दम तोड़ दिया।
इस घटना ने कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ-साथ ग्रामीण परिवहन व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी गंभीर मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए अगर परिवार को खाट और नाव का सहारा लेना पड़े, तो आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा की पहुंच पर सवाल उठना लाजिमी है।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था : अस्पताल से पहले ही थम गई सांस
परिजनों की कोशिश थी कि महिला को किसी तरह अस्पताल पहुंचाया जाए और उसका इलाज कराया जा सके। लेकिन रास्ते की मुश्किलें इतनी ज्यादा थीं कि मंजिल तक पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।
मृतका के पति रमेश जाड़े के मुताबिक महिला का पहले इलाज कराया गया था। परिवार ने पोस्टमार्टम नहीं कराने की बात कही है।
मौत की वास्तविक वजह क्या थी, इसे लेकर अभी अंतिम स्थिति सामने नहीं आई है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि जांच के बाद ही कारण स्पष्ट हो सकेगा। ऐसे में किसी बीमारी को सीधे मौत की वजह मानना उचित नहीं होगा।
फिर भी यह घटना कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की उस चुनौती को जरूर सामने लाती है, जिसमें मरीज और अस्पताल के बीच की दूरी सिर्फ कुछ किलोमीटर की नहीं, बल्कि नदी, रास्ते और परिवहन की समस्या से तय होती है।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था : 102 महतारी एक्सप्रेस को लेकर सवाल
गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए 102 महतारी एक्सप्रेस जैसी सेवाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में इस तरह की सेवा कई परिवारों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद होती है।
इस मामले में भी परिवार ने 102 सेवा से संपर्क करने की कोशिश की थी। अब यह जांच का विषय है कि कॉल कब किया गया, एंबुलेंस की उपलब्धता क्या थी और मरीज को समय पर परिवहन क्यों नहीं मिल पाया।
यदि किसी तकनीकी, भौगोलिक या अन्य कारण से एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकती थी, तो ऐसी स्थिति के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या थी, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूती सिर्फ इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितने स्वास्थ्य केंद्र संचालित हो रहे हैं। असली परीक्षा तब होती है जब किसी मरीज को आधी रात या बारिश के बीच तत्काल अस्पताल पहुंचाना हो।
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने शुरू की जांच
घटना की जानकारी मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम कंदाड़ी गांव पहुंची। अधिकारियों ने मामले की जानकारी जुटाई और महिला की स्वास्थ्य स्थिति से संबंधित रिकॉर्ड की जानकारी ली।
स्वास्थ्य विभाग के आरएमए जितेंद्र देवांगन के अनुसार महिला का 10 अगस्त को छोटेबेठिया में मलेरिया टेस्ट कराया गया था। रिपोर्ट निगेटिव आई थी। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि महिला की मौत का वास्तविक कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
यह जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि महिला की तबीयत कई दिनों से खराब थी। परिवार उसे इलाज के लिए लेकर जा रहा था और रास्ते में उसकी मौत हो गई।
इस मामले में कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर उठे सवालों का जवाब जांच रिपोर्ट से भी जुड़ा है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि महिला की बीमारी की स्थिति क्या थी और उसे किस तरह की चिकित्सा जरूरत थी।
छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक वेबसाइट
बारिश में बढ़ जाती है परेशानी
कंदाड़ी जैसे दुर्गम गांवों में बरसात का मौसम ग्रामीणों के लिए सबसे ज्यादा परेशानी वाला समय होता है। नदी-नालों में पानी बढ़ने के साथ आवागमन प्रभावित होता है।
सामान्य दिनों में ग्रामीण किसी तरह नदी पार कर लेते हैं, लेकिन मरीज को ले जाना अलग चुनौती है। गर्भवती महिला, बुजुर्ग या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को लेकर नदी पार करना जोखिम भरा हो सकता है।
यही वजह है कि कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए केवल अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। गांवों तक सड़क, पुल और आपातकालीन परिवहन की व्यवस्था भी जरूरी है।
जब तक मरीज को समय पर स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं पहुंचाया जा सकेगा, तब तक सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का पूरा फायदा ग्रामीणों को नहीं मिल पाएगा।

पुल नहीं होने से बढ़ती है मुश्किल
कंदाड़ी गांव की घटना के बाद कोटरी नदी पर पुल या सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था का मुद्दा भी सामने आया है। ग्रामीणों के लिए नदी पार करने का साधन लकड़ी की नाव है। बारिश में नदी का बहाव तेज होने पर जोखिम और बढ़ जाता है।
अगर किसी मरीज को इसी रास्ते से अस्पताल ले जाना पड़े तो हर मिनट महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे में पुल का अभाव केवल आवागमन की समस्या नहीं रह जाता, बल्कि यह स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था पर चर्चा करते समय इस बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अस्पताल तक पहुंचने वाला रास्ता सुरक्षित नहीं होगा तो मरीज के लिए अस्पताल की सुविधा भी समय पर उपयोगी साबित नहीं हो पाएगी।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था पर ग्रामीणों के सामने कई सवाल
इस घटना के बाद ग्रामीणों के मन में कई सवाल हैं। अगर किसी मरीज की अचानक हालत बिगड़ जाए तो उसे अस्पताल तक कैसे पहुंचाया जाएगा?
अगर 102 सेवा समय पर उपलब्ध नहीं हो पाए तो तत्काल विकल्प क्या है?
अगर नदी में पानी ज्यादा बढ़ जाए तो मरीज को दूसरे किनारे तक कौन पहुंचाएगा?
क्या बरसात के मौसम में दुर्गम गांवों के लिए अलग आपातकालीन व्यवस्था बनाई गई है?
क्या ऐसे गांवों की पहचान की गई है जहां एंबुलेंस सीधे नहीं पहुंच सकती?
इन सवालों के जवाब कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी मजबूती को समझने में अहम होंगे।
सिर्फ अस्पताल बनाना काफी नहीं
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा की चर्चा अक्सर अस्पताल, डॉक्टर, दवा और स्वास्थ्य केंद्र तक सीमित रहती है। लेकिन किसी मरीज को इलाज तक पहुंचाने के लिए पूरा सिस्टम काम करता है।
मरीज के घर से स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए सड़क चाहिए। सड़क नहीं है तो वैकल्पिक रास्ता चाहिए। नदी है तो पुल या सुरक्षित नाव चाहिए। आपात स्थिति है तो एंबुलेंस चाहिए। इनमें से एक भी कड़ी कमजोर हो तो मरीज की परेशानी बढ़ सकती है। कंदाड़ी की घटना ने कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की इसी पूरी श्रृंखला को सवालों के घेरे में ला दिया है।
गर्भवती महिलाओं के लिए ज्यादा जरूरी है समय पर सुविधा
गर्भावस्था के दौरान अचानक तबीयत खराब होने पर समय पर चिकित्सा सुविधा मिलना जरूरी होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह जरूरत और बढ़ जाती है क्योंकि अस्पताल अक्सर दूर होते हैं। अगर रास्ते में नदी पड़ती है और उसे नाव से पार करना पड़ता है, तो आपात स्थिति में खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था में गर्भवती महिलाओं के लिए गांव स्तर पर निगरानी, समय पर रेफरल और आपातकालीन परिवहन को मजबूत करना महत्वपूर्ण है। ग्रामीण परिवारों को यह भरोसा होना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर उन्हें मरीज को खाट पर लेकर नदी तक नहीं जाना पड़ेगा।
परिवार के लिए सबसे कठिन समय
सुलाता जाड़े के परिवार के लिए यह घटना बेहद दुखद है। जिस समय परिवार को इलाज की उम्मीद थी, उसी समय उसे महिला की मौत का सामना करना पड़ा। परिजनों ने अपनी तरफ से महिला को अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन रास्ते की परिस्थितियों ने मुश्किल बढ़ा दी।
मृतका के पति ने पोस्टमार्टम नहीं कराने की बात कही है। परिवार की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को मामले से जुड़े सभी तथ्यों की जांच करनी होगी। इस घटना के बाद कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था में क्या सुधार किए जा सकते हैं, इस पर भी ध्यान देना जरूरी है।

जांच से सामने आएगी वास्तविक तस्वीर
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग ने मामले की जांच शुरू कर दी है। जांच में महिला की बीमारी, इलाज, एंबुलेंस से संपर्क और अस्पताल तक पहुंचने की कोशिश से जुड़े पहलुओं को देखा जाना जरूरी है। मौत की चिकित्सकीय वजह भी जांच के बाद ही सामने आएगी।
एंबुलेंस को लेकर परिवार की शिकायत की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सेवा में देरी हुई थी या फिर भौगोलिक परिस्थितियों के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाई। ऐसे सभी सवालों का जवाब मिलने के बाद ही कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर कोई ठोस निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।
स्थायी समाधान की जरूरत
कंदाड़ी की घटना को केवल एक दुखद हादसा मानकर भूल जाना समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रशासन को यह देखना होगा कि गांव में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।
दुर्गम गांवों में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर आपातकालीन परिवहन व्यवस्था बनाई जा सकती है। नदी के आसपास रहने वाले गांवों के लिए सुरक्षित नाव की व्यवस्था भी जरूरी हो सकती है। जहां स्थायी पुल की जरूरत है, वहां संबंधित विभागों को प्रस्ताव और निर्माण की स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए स्वास्थ्य विभाग के साथ सड़क, पंचायत, लोक निर्माण और जिला प्रशासन जैसे विभागों के बीच समन्वय भी जरूरी है।
सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं
कंदाड़ी की घटना से उठे सवाल सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं हैं। कांकेर जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण जिले में कई गांव ऐसे हैं जहां बरसात के दिनों में आवागमन मुश्किल हो जाता है। ऐसे इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तैयार करना जरूरी है।
मैदानी इलाके में काम करने वाली व्यवस्था को नदी और जंगल से घिरे गांवों में उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता। वहाँ अलग रणनीति और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत होती है। यही वजह है कि कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सामने आई यह घटना प्रशासन के लिए एक चेतावनी की तरह देखी जा सकती है।
नाव में मौत ने छोड़ दिए कई सवाल
एक गर्भवती महिला इलाज के लिए निकली। घर से खाट पर निकली। नदी तक पहुंची। लकड़ी की नाव में बैठी। लेकिन अस्पताल तक नहीं पहुंच सकी। यह पूरा घटनाक्रम अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। क्या समय पर एंबुलेंस होती तो स्थिति अलग होती? क्या गांव तक बेहतर सड़क होती तो महिला जल्दी अस्पताल पहुंच सकती थी? क्या नदी पर पुल होता तो परिवार को नाव का सहारा लेना पड़ता?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद सामने आ सकता है, लेकिन घटना ने कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी चुनौतियों को जरूर उजागर किया है।
अब आगे क्या?
फिलहाल सबकी नजर स्वास्थ्य विभाग की जांच पर है। जांच में महिला की मौत का कारण, इलाज का इतिहास और एंबुलेंस सेवा से जुड़े पहलुओं की स्थिति साफ हो सकती है।
इसके साथ ही प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दुर्गम गांवों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को कैसे मजबूत किया जाए।
कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का मतलब सिर्फ नई घोषणाएं करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जरूरत के समय मरीज तक सुविधा पहुंचे।
कंदाड़ी की घटना ने यह बात साफ कर दी है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में सड़क, पुल और एंबुलेंस जैसी सुविधाएं भी इलाज का ही हिस्सा हैं।
जब तक मरीज अस्पताल तक सुरक्षित और समय पर नहीं पहुंचता, तब तक अस्पताल में मौजूद इलाज की सुविधा अधूरी रह जाती है।
इसलिए अब जरूरत है कि जांच के साथ-साथ कंदाड़ी और आसपास के दुर्गम गांवों की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाए। कांकेर स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर उठे सवालों का जवाब जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से ही मिल सकेगा।
