धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो! कॉकरोच जनता की आग अब सड़क पर भड़क रही है
नई दिल्ली। जंतर मंतर की धरती पर इन दिनों गुस्से की लपटें आसमान छू रही हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के युवा समर्थक लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। ये युवा चुप नहीं बैठ रहे। वे बार-बार सड़क पर आ रहे हैं और अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
सोमवार को संसद चलो मार्च के दौरान जो कुछ हुआ, वह किसी भी लोकतंत्र के लिए शर्म की बात है। पुलिस ने इन युवाओं पर लाठियां बरसाईं। आंसू गैस के गोले ऐसे दागे गए जैसे कोई दुश्मन से लड़ाई हो रही हो। कई युवा घायल हो गए। एक युवा छात्रा तो बहुत गंभीर रूप से घायल हो गई है। वह राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती है और जिंदगी-मौत से संघर्ष कर रही है। खून से सने युवा सड़क पर गिरे पड़े थे, लेकिन सरकार की आंखों में अभी भी कोई शर्म नहीं दिख रही।

फिर भी ये हिम्मती युवा नहीं माने। लाठियां खाकर, आंसू गैस झेलकर भी दोबारा जंतर मंतर पर जुट गए हैं। उनका विरोध प्रदर्शन जारी है। यह देखकर साफ हो गया है कि अब यह सिर्फ एक परीक्षा पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है। यह पूरे शिक्षा सिस्टम की खस्ता हालत, बेरोजगारी और सत्ता के घमंड के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई बन गई है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव इस पूरे आंदोलन को ऐतिहासिक बता रहे हैं। उन्होंने मंच से जो बात कही, वह सुनकर हर युवा का खून खौल उठा होगा। उन्होंने कहा कि ठीक 50 साल पहले साल 1974 में इस देश में युवाओं का एक बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसे जेपी आंदोलन कहा जाता है। उस समय भी युवा शिक्षा और रोजगार के सवाल पर सड़कों पर उतर आए थे। सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थी। तब युवाओं ने कहा कि सरकार बदलनी पड़ेगी।

आज 50 साल बाद फिर वही मंजर है। योगेंद्र यादव कहते हैं कि आज युवा इस देश की राजनीति और विकास के मुख्य मुद्दों के केंद्र में आ गए हैं। शिक्षा और रोजगार का सवाल, जो सदियों से केंद्र में होना चाहिए था, आज आखिरकार केंद्र में आया है। साथ ही देश में जो तानाशाही धीरे-धीरे बढ़ रही है, उसे तोड़ने की शुरुआत हो गई है। 20 जुलाई को दिल्ली में जो हुआ, वह ऐतिहासिक घटना है।
उन्होंने और भी साफ शब्दों में कहा कि अब इस देश में लोकतंत्र का भविष्य संसद से तय नहीं होगा। वह सड़क से तय होगा। चुनाव से तय नहीं होगा, बल्कि प्रतिरोध से तय होगा। 20 जुलाई को हमने उसकी एक झलक देख ली है।

सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि वे संसद में नीट पेपर लीक मामले पर चर्चा करने को तैयार हैं। लेकिन जब युवा सड़क पर आकर अपनी मांग रख रहे हैं, तब उन पर पुलिस की लाठियां क्यों चलाई जा रही हैं? पहले युवाओं पर अत्याचार बंद करो, फिर संसद की चर्चा की बात करो।
योगेंद्र यादव ने संस्थानों की नाकामी पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह सब शुरू ही संस्थानों की नाकामियों से हुआ है। जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस देश के बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच कह देते हैं, बाद में सफाई देते हैं। जब एनटीए और अन्य परीक्षा कराने वाली संस्थाएं बार-बार फेल हो जाती हैं। जब सीबीएसई जैसी संस्थाएं भी रोजमर्रा की परीक्षाएं ठीक से नहीं करा पातीं, तो सारा गुस्सा युवाओं पर निकाला जा रहा है।

वे कहते हैं कि जिन संस्थानों की नाकामियों की वजह से यह सब शुरू हुआ, वही संस्थान अब इसका इलाज नहीं कर सकते। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा एक प्रतीकात्मक मांग है। इसका मतलब है कि सिस्टम में जवाबदेही होनी चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस सरकार से जवाबदेही आने वाली है।
पुलिस की बर्बरता को देखकर लगता है कि सरकार युवाओं को अपना दुश्मन समझ रही है। छात्रों ने शिकायत की, सरकार ने नहीं सुनी। सोचा कि जंतर मंतर पर कुछ लोग बैठा दो, 10 मिनट में आंदोलन खत्म हो जाएगा। मीडिया को दबा दो, कोई रिपोर्ट नहीं करेगा। लेकिन यह सोच पूरी तरह गलत साबित हुई। आंदोलन न केवल जारी है, बल्कि और मजबूत हो रहा है।

योगेंद्र यादव कहते हैं कि तानाशाहों को लगता है कि सब कुछ मैनेज कर लेंगे या दमन कर देंगे। लेकिन एक स्टेज के बाद दमन भी फेल हो जाता है और तानाशाही का अंत शुरू हो जाता है। इस आंदोलन में ठीक यही हो रहा है।
सरकार के पास जवाबदेही का कोई रिकॉर्ड नहीं दिख रहा। पहले के समय में कई मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे देते थे। जवाहरलाल नेहरू के मंत्री कृष्ण मेनन ने भारत-चीन युद्ध के बाद इस्तीफा दिया। लाल बहादुर शास्त्री ने रेल हादसे के बाद खुद इस्तीफा दे दिया। नीतीश कुमार ने भी रेल हादसे के बाद इस्तीफा दिया। लेकिन आज की सरकार में ऐसे उदाहरण नदारद हैं।

कांग्रेस ने भी प्रधानमंत्री और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए पीएम आवास के बाहर धरना दिया। लेकिन सरकार की तरफ से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि पहले भी कई राज्यों में पेपर लीक होते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब आप सत्ता में हो तो अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं ले रहे?
योगेंद्र यादव ने कहा कि मौजूदा सरकार सामान्य लोकतांत्रिक सरकार की तरह काम नहीं कर रही। दुनिया के कई लोकतंत्र अध्ययन संस्थान भारत को अब चुनावी तानाशाही या प्रतिस्पर्धी तानाशाही की श्रेणी में रख रहे हैं।

उन्होंने इमरजेंसी का जिक्र भी किया। वे खुद इमरजेंसी के समय के हैं। उन्होंने बताया कि उस समय भी मीडिया और संस्थानों को कंट्रोल किया गया था। लेकिन आज का सबसे बड़ा फर्क तकनीक का है। निगरानी के साधन ज्यादा विकसित हैं, लेकिन सोशल मीडिया ने प्रतिरोध को भी तेज और व्यापक बना दिया है।
उन्होंने इस आंदोलन की तुलना 2011 के अन्ना आंदोलन से की। अन्ना आंदोलन में लोग पिकनिक की तरह जाते थे, कोई बड़ा खतरा नहीं था। लेकिन आज के आंदोलन में युवा अपनी नौकरी और भविष्य का बड़ा खतरा उठाकर आ रहे हैं। मीडिया भी चुप है, फिर भी आंदोलन बढ़ रहा है।

योगेंद्र यादव ने शिक्षा व्यवस्था पर चोट करते हुए कहा कि आज शिक्षा न तो अच्छी गुणवत्ता दे पा रही है और न ही रोजगार की गारंटी। निजीकरण, संस्थाओं की गिरावट और नई तकनीकों के कारण भविष्य में रोजगार की समस्या और बढ़ेगी। 20 जुलाई का प्रदर्शन इसी बड़े संकट की अभिव्यक्ति है।
विपक्षी दलों की भूमिका पर उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल अपने हित देखते हैं, यह स्वाभाविक है। लेकिन आंदोलन की दिशा आखिरकार युवाओं के हाथ में है। देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा आ रहे हैं और आगे भी वे ही आंदोलन की दिशा तय करेंगे।

सरकार को अब समझ लेना चाहिए कि युवा जाग चुके हैं। पुलिस की बर्बरता, लाठियां, आंसू गैस और तानाशाही वाले तरीके अब काम नहीं करेंगे। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए। संस्थानों में जवाबदेही लानी चाहिए। युवाओं के सवालों को गंभीरता से लेना चाहिए।
अगर सरकार अभी भी आंखें बंद रखेगी और दमन का रास्ता अपनाएगी तो यह आग पूरे देश में फैल सकती है। जंतर मंतर पर आज जो चिंगारी सुलग रही है, वह कल बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है।
पुलिस की बर्बरता बंद करो।
सरकार की तानाशाही बंद करो।
धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो।
युवाओं की आवाज सुनो।
यह आंदोलन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि बदलाव की पुकार है। युवा तैयार हैं। अब देखना है कि सरकार क्या करती है।
