आय से अधिक संपत्ति मामला में रेखा नायर को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी।
बिलासपुर, आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपों का सामना कर रहीं पुलिस अधिकारी रेखा नायर को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से कोई राहत नहीं मिल सकी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने पहले ही अभियोजन स्वीकृति से जुड़ी मूल फाइल, नोटशीट और विभागीय पत्राचार तलब करने की मांग को अस्वीकार कर दिया था, साथ ही स्वीकृति देने वाले अधिकारी को अदालत में तलब कर पूछताछ करने की अर्जी भी नामंजूर कर दी थी। हाईकोर्ट ने इन दोनों फैसलों को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
आय से अधिक संपत्ति मामला
यह विवाद क्राइम नंबर 08/2019 से संबंधित है। जांच एजेंसी के अनुसार, 1 मार्च 2011 से लेकर 20 फरवरी 2019 के बीच की अवधि में रेखा नायर के नाम पर लगभग 1.21 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्ति दर्ज पाई गई, जो उनके वैध और ज्ञात आय स्रोतों के हिसाब से कहीं अधिक बताई गई। इसी असंगति को आधार बनाते हुए 27 फरवरी 2019 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(b) तथा 13(2) के अंतर्गत उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इन धाराओं के तहत किसी लोक सेवक द्वारा आय के ज्ञात स्रोतों से अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करना आपराधिक कदाचार माना जाता है।
लोक आयोग की पुरानी जांच में नहीं मिला था कोई ठोस निष्कर्ष
दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले भी रेखा नायर की संपत्ति की जांच हो चुकी थी। वर्ष 2017 में छत्तीसगढ़ राज्य लोक आयोग ने उनकी अनुपातहीन संपत्ति से जुड़ी शिकायत पर स्वतंत्र रूप से पड़ताल शुरू की थी। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक, आयोग ने उनकी आय, व्यय और संपत्तियों का बारीकी से मूल्यांकन करने के बाद 9 जनवरी 2019 को यह निष्कर्ष दर्ज किया कि उनके पास जो कुछ भी संपत्ति है, वह उनके वैध आय स्रोतों की सीमा में ही है और इसमें किसी तरह की गड़बड़ी या कदाचार साबित नहीं होता।

हालांकि यह मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। लोक आयोग की क्लीन चिट के बावजूद, एक दूसरी शिकायत मिलने के बाद राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने अपने स्तर पर स्वतंत्र जांच आगे बढ़ाई, जिसके परिणामस्वरूप नया आपराधिक मामला दर्ज हुआ। यानी एक ही व्यक्ति की संपत्ति को लेकर दो अलग-अलग जांच एजेंसियों ने अलग-अलग समय पर विरोधाभासी निष्कर्ष निकाले — यह बात अब मामले को और पेचीदा बनाती है।
अभियोजन स्वीकृति की फाइल कई बार लौटी, आखिरकार 2020 में मिली मंजूरी
रिकॉर्ड बताते हैं कि रेखा नायर के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया भी सीधी नहीं रही। सक्षम प्राधिकारी के समक्ष भेजी गई फाइल को कई बार आपत्तियों के साथ वापस लौटाया गया। 26 दिसंबर 2019, 3 जनवरी 2020 और फिर 31 जनवरी 2020 को क्रमशः जांच के अधूरेपन, आय-व्यय के हिसाब-किताब में विसंगतियों और ACB की रिपोर्ट में मौजूद खामियों को लेकर सवाल खड़े किए गए। इन तीन दौर की आपत्तियों और संशोधनों के बाद अंततः 6 मार्च 2020 को अभियोजन स्वीकृति जारी की गई, जिसके आधार पर रेखा नायर के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ना शुरू हुआ।
Chhattisgarh High Court – Order & Judgement Search
रेखा नायर की ओर से इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया। उनका तर्क था कि जब फाइल को बार-बार आपत्तियों के साथ लौटाया गया था, तो यह जानना जरूरी है कि अंतिम स्वीकृति किन आधारों पर और किस स्वतंत्र विवेचना के बाद दी गई। इसी वजह से उन्होंने अदालत से मूल फाइल, नोटशीट और तत्कालीन विभागीय पत्राचार तलब करने का अनुरोध किया था, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अंतिम मंजूरी वास्तव में स्वतंत्र सोच-विचार का नतीजा थी या महज औपचारिकता।
हाईकोर्ट ने कहा ” यह मिनी-ट्रायल का मंच नहीं”
खंडपीठ ने रेखा नायर की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद अंतिम अभियोजन स्वीकृति में यह उल्लेख है कि सक्षम प्राधिकारी ने जांच के दौरान जुटाए गए तथ्यों, सबूतों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद ही निर्णय लिया। अदालत के अनुसार, केवल इस आधार पर कि पहले के प्रस्ताव आपत्तियों के साथ लौटाए गए थे, यह नहीं माना जा सकता कि अंतिम मंजूरी बिना उचित विवेचना के दी गई। दरअसल फाइल का बार-बार लौटना यह भी दिखाता है कि प्रक्रिया में सतर्कता बरती गई और खामियों को दूर करने के बाद ही अंतिम फैसला लिया गया।

स्वीकृति देने वाले अधिकारी को अदालत में बुलाकर पूछताछ करने की मांग पर भी हाईकोर्ट ने राहत नहीं दी। पीठ ने पाया कि यह मांग पहले ही 22 अक्टूबर 2024 को ट्रायल कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी थी, और उस विशेष आदेश को कभी अलग से चुनौती नहीं दी गई। ऐसे में उसी मुद्दे को दोबारा मौजूदा याचिका के जरिए उठाना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना गया।
मुकेश गुप्ता प्रकरण और फोन टैपिंग विवाद से भी जुड़ा रहा है नाम
रेखा नायर का नाम इससे पहले भी सुर्खियों में रह चुका है। वे तत्कालीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी मुकेश गुप्ता की स्टेनोग्राफर के तौर पर कार्यरत थीं, और उसी दौर में चर्चित फोन इंटरसेप्शन यानी टैपिंग विवाद में भी उनका नाम सामने आया था। मौजूदा हाईकोर्ट के आदेश में भी इस बात का उल्लेख है कि उनके खिलाफ अवैध इंटरसेप्शन से जुड़ा एक अलग मामला भी दर्ज है, जिसमें उन्हें आरोपी बनाया गया है। गौरतलब है कि उस अलग मामले की जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर 2019 को ही रोक लगा दी थी, जो अभी तक जारी है।
इसके अलावा पुराने दौर में यह भी आरोप लगते रहे हैं कि कचना स्थित उनके सरकारी आवास से फोन टैपिंग की गतिविधियां संचालित होती थीं, और यह भी कि वे नियमित रूप से ड्यूटी पर उपस्थित न होने के बावजूद वेतन प्राप्त करती रहीं। हालांकि इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित करना जरूरी है कि इन विशिष्ट आरोपों की पुष्टि मौजूदा हाईकोर्ट के फैसले में नहीं होती। इसलिए इन्हें अभी सिर्फ आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्य के रूप में।
अब आगे क्या मामला ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगा ?
यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाईकोर्ट के इस फैसले का मतलब यह कतई नहीं है कि रेखा नायर को दोषी करार दिया गया है। अदालत ने केवल उनकी मौजूदा याचिका को खारिज किया है, जिसमें मूल फाइल तलब करने और स्वीकृति देने वाले अधिकारी से पूछताछ की मांग की गई थी। अभियोजन स्वीकृति की वैधता सहित बाकी सभी कानूनी आपत्तियां वे उचित समय पर ट्रायल के दौरान उठा सकती हैं — यह अधिकार उनके पास सुरक्षित रखा गया है।
इस पूरे प्रकरण को देखें तो इसमें कई परतें एक साथ उलझी हुई नज़र आती हैं। एक तरफ 2019 में लोक आयोग की जांच में आय से अधिक संपत्ति का कोई निष्कर्ष नहीं निकला था, वहीं दूसरी तरफ बाद में हुई ACB की जांच में करीब 1.21 करोड़ रुपये की अनुपातहीन संपत्ति का आरोप लगाया गया। इसके अलावा अभियोजन स्वीकृति से पहले उठी प्रक्रियागत आपत्तियां, और पुराने फोन इंटरसेप्शन विवाद से जुड़ा इतिहास — ये सभी पहलू अभी ट्रायल कोर्ट में विस्तार से जांचे जाने बाकी हैं।
फिलहाल स्थिति यह है कि हाईकोर्ट का रुख साफ है: याचिका खारिज हुई है, लेकिन मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। रेखा नायर के खिलाफ चल रहा आपराधिक ट्रायल अपनी गति से आगे बढ़ता रहेगा, और अब यह देखना बाकी होगा कि निचली अदालत में सबूतों और गवाहियों के आधार पर अंततः क्या नतीजा निकलता है।
