भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए दो बड़े सरकारी हथियार बनाए गए हैं, लोकायुक्त और EOW यानी आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो। सुनने में यह नाम जितने दमदार लगते हैं, इनके नतीजे उतने ही हल्के निकलते हैं। हाल ही में जब लोकायुक्त और EOW ने अलग-अलग विभागों में छापे मारे, तो एक-एक अफसर के घर से करोड़ों की संपत्ति, किलो भर चांदी और लाखों नकद बरामद हुए। लेकिन असली कहानी छापों में नहीं, बल्कि उसके बाद के आंकड़ों में छिपी है — जहां भ्रष्टाचार पकड़ने वाला यह पूरा सिस्टम खुद ही कठघरे में खड़ा नजर आता है। लोकायुक्त मध्य प्रदेश
चार अफसर, चार कहानियां, एक जैसा हिसाब-किताब
सबसे पहले बात करते हैं उन चार मामलों की, जिन्होंने पूरे मध्य प्रदेश में हलचल मचा दी और जिन्हें लोकायुक्त की टीम ने ही एक-एक कर बेनकाब किया। मामला नंबर एक — मध्य प्रदेश बिजली वितरण कंपनी के अधीक्षण यंत्री शिवराम सोमिल, जिन्हें लोकायुक्त की कार्रवाई ने सुर्खियों में ला दिया। 33 साल की नौकरी में इनकी वैध कमाई करीब 2 करोड़ रुपए होनी चाहिए थी, लेकिन घर से निकली संपत्ति करीब 17 करोड़ रुपए की, यानी हिसाब से 258% ज्यादा। घर से 4 किलो चांदी, 300 ग्राम सोना और 3 लाख नकद भी मिले।

सिलिकॉन सिटी में तीन मंजिला आलीशान मकान, बेटे के नाम फैक्टरी और बहू-रिश्तेदारों के नाम कंपनी अलग से। सरकारी नौकरी का यह गणित समझ से परे है — तनख्वाह से कमाई कम, बिजली के तार जितनी लंबी संपत्ति की लिस्ट ज्यादा।
मामला नंबर दो — एमवाय हॉस्पिटल के फार्मासिस्ट राकेश गोरखे और उनकी लाइब्रेरियन पत्नी कीर्ति गोरखे, जिनकी संपत्ति की परतें लोकायुक्त की जांच में एक-एक कर खुलती गईं। दोनों की मिलाकर वैध आय करीब 1 करोड़ 11 लाख आंकी गई, लेकिन संपत्ति निकली 2 करोड़ 13 लाख से ज्यादा, यानी 108% अधिक। दवाइयों की सरकारी खरीद के नाम पर 5-6 डमी फर्मों का जाल बिछाया गया बताया जाता है। सरकारी अस्पताल में मरीजों को भले ही दवा मिले न मिले, कागजों पर सप्लाई जरूर पूरी होती रही।
मामला नंबर तीन — इंदौर नगर निगम के सहायक राजस्व अधिकारी जितेंद्र कुमार पांडेय, जिनकी अनुपातहीन संपत्ति को लोकायुक्त ने अपनी छापेमारी में उजागर किया। इनकी वैध आय करीब 80 लाख आंकी गई, जबकि संपत्ति मिली 4.59 करोड़ रुपए की, यानी हिसाब से 474.84% ज्यादा। पत्नी के नाम पर एक जगह G+3 इमारत, दूसरी जगह G+2 इमारत जिसमें हॉस्टल चल रहा था। आरोप है कि बड़ी-बड़ी इमारतों को कागज पर खाली प्लॉट दिखाकर टैक्स बचाया जाता रहा। यानी जमीन पर मकान खड़ा, कागज पर सिर्फ मिट्टी।
मामला नंबर चार — महिला एवं बाल विकास विभाग इंदौर के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल, जिनकी करोड़ों की संपत्ति का हिसाब लोकायुक्त की प्रारंभिक जांच में सामने आया। इनके पास करीब 9.5 करोड़ की संपत्ति मिली, पीथमपुर में 12 प्लॉट, इंदौर में कमर्शियल प्लॉट, घर में हाईटेक जिम और डिपार्टमेंटल स्टोर। वैध आय से यह संपत्ति 241% ज्यादा बताई गई। आरोप है कि कुपोषण और आंगनवाड़ी के बजट में गड़बड़ी की गई। यानी जिस विभाग का काम बच्चों तक पोषण पहुंचाना था, वहां अफसर का अपना घर पूरी तरह “पोषित” निकला।
भ्रष्टाचार के चार अलग-अलग रास्ते, मंजिल एक ही
इन चारों मामलों को गौर से देखें, जिन्हें लोकायुक्त ने अलग-अलग समय पर उजागर किया, तो एक बात साफ नजर आती है — तरीका अलग, लेकिन नीयत एक जैसी। कोई टेंडर में पसंदीदा फर्मों को फायदा पहुंचा रहा था, कोई दवाइयों की फर्जी सप्लाई दिखा रहा था, कोई इमारतों को कागज पर गायब कर रहा था, तो कोई बच्चों के पोषण के बजट को अपने घर का पोषण बना रहा था। हर विभाग में तरीका अलग जरूर था, लेकिन नतीजा एक ही निकला — सरकारी पद निजी तिजोरी भरने का जरिया बन गया।

इतने सालों तक यह सब चलता कैसे रहा?
यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है। सवाल यह नहीं है कि इन अफसरों ने कमाया कैसे, सवाल यह है कि लोकायुक्त की नजर से बचते हुए इतने बड़े स्तर की गड़बड़ी सालों-साल चलती रही और विभागीय निगरानी तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। जिस महकमे का काम ही निगरानी करना था, वह खुद इतने लंबे समय तक “निगरानी” से बाहर कैसे रहा — यह सवाल पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
दो वसीयतें, तीन अफसर, एक गलती: MP हाईकोर्ट ने बता दिया कि जमीन का हक कौन तय करेगा ?
अब बात करते हैं असली मुद्दे की — आंकड़े जो सिस्टम की पोल खोलते हैं
अगर ऊपर के चार मामले भ्रष्टाचार की कहानी हैं, तो अब जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे भ्रष्टाचार रोकने वाले सिस्टम की कहानी बयां करते हैं, और यह कहानी उतनी ही चौंकाने वाली है।
विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से अब तक लोकायुक्त ने 1,063 मामले दर्ज किए। इन मामलों में 1,379 अफसर जांच के दायरे में आए। इतने बड़े आंकड़े देखकर लगता है कि जैसे भ्रष्टाचार पर जोरदार शिकंजा कसा जा रहा हो। लेकिन जब नतीजों पर नजर डालते हैं, तो तस्वीर बदल जाती है, इन 1,063 मामलों में से सिर्फ 7 मामलों में आरोप सिद्ध हो पाए। यानी कन्विक्शन रेट सिर्फ 0.65%। साफ शब्दों में कहें तो हर 100 मामलों में से करीब 99 मामले किसी न किसी मोड़ पर बीच रास्ते में ही ठहर जाते हैं, और सिर्फ एक मामला मंजिल तक पहुंच पाता है। मध्यप्रदेश विधानसभा

आंकड़ों को और गहराई से देखें तो 1,884 शिकायतों में से 1,063 आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें से 393 मामलों की जांच पूरी हुई, लेकिन 134 मामले अब भी अभियोजन की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। सिर्फ 39 मामलों में प्रारंभिक अभियोजन कार्रवाई शुरू हुई, 208 मामलों में चालान पेश हुए, और आखिर में सजा मिली सिर्फ 7 मामलों में। यानी शिकायत से सजा तक का यह सफर इतना लंबा और उलझा हुआ है कि रास्ते में ही ज्यादातर मामले दम तोड़ देते हैं।
EOW की कहानी और भी दिलचस्प — शिकायत बहुत, कार्रवाई मुट्ठी भर
लोकायुक्त की तरह ही अब बात करते हैं EOW यानी आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की, जो लोकायुक्त की तरह ही भ्रष्टाचार रोकने का दूसरा बड़ा हथियार माना जाता है। विधानसभा में सरकार ने खुद बताया कि 2020 से जनवरी 2026 तक EOW को कुल 19,775 शिकायतें मिलीं, यानी हर साल औसतन तीन हजार से ज्यादा शिकायतें। अकेले जनवरी 2026 में 437 शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन इन करीब बीस हजार शिकायतों में से औपचारिक रूप से दर्ज हुईं सिर्फ 2,624 शिकायतें यानी लगभग 14 प्रतिशत। और सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि सिर्फ 566 मामलों में एफआईआर दर्ज हुई, जो कुल शिकायतों का महज 2.8 फीसदी है।
यानी अगर सौ लोग शिकायत लेकर EOW के दरवाजे पर पहुंचें, तो उनमें से करीब तीन लोगों की शिकायत ही एफआईआर तक पहुंच पाती है। बाकी सत्तानवे शिकायतें किस फाइल में, किस दराज में और किस अफसर की मेज के नीचे दबी रह जाती हैं, इसका हिसाब शायद खुद विभाग के पास भी नहीं होगा।
जब पकड़ने वाला सिस्टम ही “धीमी गति” का शिकार हो जाए
यह पूरी तस्वीर एक बड़ी विडंबना की तरफ इशारा करती है। एक तरफ अफसरों के घरों से करोड़ों की बेहिसाब संपत्ति, चांदी, सोना, नकदी और फर्जी कंपनियां बरामद हो रही हैं। दूसरी तरफ जिस सिस्टम का काम इन गड़बड़ियों को पकड़कर सजा तक पहुंचाना है, वह खुद 0.65% और 2.8% जैसे आंकड़ों में सिमटा हुआ है। सवाल यह उठता है कि आखिर भ्रष्टाचार रोकने वाला यह तंत्र किसके लिए ज्यादा मुस्तैद है भ्रष्टाचार पकड़ने के लिए, या भ्रष्टाचार को कागजी प्रक्रिया की भूलभुलैया में उलझाए रखने के लिए?
एक्सपर्ट की राय — डर के बिना दवा असर नहीं करती
इस पूरे मसले पर जानकारों और एक्सपर्ट का कहना है कि भ्रष्टाचार करने वालों में कानून का डर होना बेहद जरूरी है, और इसके लिए मामलों में जल्द सजा का प्रावधान होना चाहिए। वे इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की अपराध नियंत्रण नीति का उदाहरण देते हैं। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि वे उस नीति के सही या गलत होने पर टिप्पणी नहीं कर रहे, बल्कि सिर्फ यह बता रहे हैं कि उस मॉडल में अपराधियों के भीतर कार्रवाई का डर दिखाई देता है।
डॉ. गुप्ता के मुताबिक, भ्रष्टाचार के मामलों में केस दर्ज होने के बाद लंबे समय तक मुकदमे लटकने नहीं चाहिए। जितनी जल्दी सजा मिलेगी, उतना ही भ्रष्टाचार करने वालों के भीतर कानून का डर बढ़ेगा। लोकायुक्त के मौजूदा आंकड़े देखकर यह समझना मुश्किल नहीं है कि डॉ. गुप्ता आखिर यह बात इतनी गंभीरता से क्यों कह रहे हैं, जहां लोकायुक्त के 1,063 मामलों में सिर्फ 7 को सजा मिली हो, वहां डर की जगह भरोसा ज्यादा मजबूत नजर आता है, कि “पकड़े भी गए तो क्या फर्क पड़ेगा।”
नतीजा क्या निकलता है इस पूरी पड़ताल से?
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के यह चार ताजा मामले सिर्फ चार अफसरों की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम की कहानी है जिसकी बुनियाद ही निगरानी और जवाबदेही पर टिकी होनी चाहिए थी। लोकायुक्त जैसा संस्थान, जिसकी साख भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए बनी थी, और EOW जैसे संस्थान कागजों पर जितने मजबूत नजर आते हैं, नतीजों में उतने ही कमजोर साबित हो रहे हैं। हजारों शिकायतें, सैकड़ों दर्ज मामले, और आखिर में मुट्ठी भर सजाएं — यह आंकड़े खुद बता रहे हैं कि कहीं न कहीं वह कड़ी कमजोर है, जो शिकायत को सजा तक पहुंचाती है।
जब तक शिकायत दर्ज होने से लेकर सजा मिलने तक का यह सफर छोटा और तेज नहीं होता, तब तक करोड़ों की बेहिसाब संपत्ति, किलो भर सोना-चांदी और डमी कंपनियों की कहानियां अखबारों की सुर्खियां तो बनती रहेंगी, लेकिन असली नतीजा वहीं का वहीं — 0.65% और 2.8% के बीच अटका रह जाएगा। लोकायुक्त को अगर सच में भ्रष्टाचार रोकना है, तो शायद सबसे पहले खुद अपनी रफ्तार पर सवाल उठाने की जरूरत है, वरना छापे तो होते रहेंगे, लेकिन लोकायुक्त की साख सिर्फ आंकड़ों में ही उलझी रह जाएगी।
(नोट: उपरोक्त सभी मामले जांच और अदालती प्रक्रिया के दायरे में हैं। भारतीय कानून के अनुसार जब तक अदालत में दोष सिद्ध नहीं होता, किसी भी आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता। लेख में उल्लेखित आंकड़े विधानसभा में पेश आधिकारिक जानकारी और लोकायुक्त की कार्रवाई पर आधारित हैं।)
